भारत में, यदि कोई वैध वसीयत है तो आमतौर पर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती है। इसके बजाय, वसीयत की प्रोबेट की आवश्यकता होती है। अंतर इस प्रकार है: उत्तराधिकार प्रमाणपत्र: इसका उपयोग मुख्य रूप से तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मर जाता है। इसे न्यायालय से प्राप्त किया जाता है ताकि कानूनी उत्तराधिकारी को मृतक की चल संपत्ति जैसे बैंक खाते, बॉन्ड या शेयर आदि को विरासत में लेने और प्रबंधित करने का अधिकार मिल सके। वसीयत की प्रोबेट: यदि कोई वसीयत है, तो कानूनी उत्तराधिकारियों को न्यायालय से वसीयत की प्रोबेट प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत। यह वसीयत की वैधता को प्रमाणित करता है और निष्पादक को वसीयत के निर्देशों के अनुसार संपत्ति का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। इसलिए, यदि आपके पास वसीयत है और आप वसीयत के अनुसार संपत्ति या परिसंपत्तियों का दावा करना चाहते हैं, तो आपको आमतौर पर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के बजाय प्रोबेट की आवश्यकता होगी। हालाँकि, प्रोबेट की आवश्यकता संपत्ति के प्रकार और अधिकार क्षेत्र पर निर्भर हो सकती है।
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