बोलम परीक्षण एक कानूनी सिद्धांत है जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि क्या किसी चिकित्सा पेशेवर ने लापरवाही बरती है। यह एक अंग्रेजी मामले (बोलम बनाम फ्रीर्न अस्पताल प्रबंधन समिति, 1957) से लिया गया है और भारत में भी लागू होता है। अर्थ: यदि किसी डॉक्टर के कार्य उस विशेष क्षेत्र में कुशल चिकित्सा पेशेवरों के एक जिम्मेदार निकाय द्वारा उचित मानी जाने वाली कार्यप्रणाली के अनुसार हैं, तो वह लापरवाह नहीं है - भले ही किसी अन्य निकाय की राय अलग हो। भारत में: न्यायालय चिकित्सा लापरवाही के मामलों का निर्णय करने में बोलम परीक्षण लागू करते हैं, लेकिन वे यह भी अपेक्षा करते हैं कि देखभाल का मानक उचित हो, पुराना न हो। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) के तहत, लापरवाही (चिकित्सा लापरवाही सहित) से मृत्यु का कारण बनना परिस्थितियों के आधार पर 2 वर्ष तक के कारावास या जुर्माने, या दोनों से दंडनीय है। यह परीक्षण यह तय करने में मदद करता है कि क्या यह कृत्य एक उचित पेशेवर निर्णय था या कर्तव्य का उल्लंघन था जिसके कारण आपराधिक दायित्व उत्पन्न होता है।
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