Answer By law4u team
भारत में रेगुलर बेल और एंटीसिपेटरी बेल में अंतर: रेगुलर बेल: किसी व्यक्ति के पहले ही गिरफ्तार होने के बाद दी जाती है आरोपी पुलिस या ज्यूडिशियल कस्टडी में है कस्टडी से रिहाई के लिए एप्लीकेशन फाइल की जाती है केस के आधार पर मजिस्ट्रेट, सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा दी जाती है भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत शासित एंटीसिपेटरी बेल: गिरफ्तारी से पहले दी जाती है इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति को डर होता है कि उसे किसी नॉन-बेलेबल अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है गिरफ्तारी से ही सुरक्षा देता है सिर्फ सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा दी जाती है यह भी उसी कानून के तहत शासित है मुख्य अंतर: स्टेज: रेगुलर बेल → गिरफ्तारी के बाद एंटीसिपेटरी बेल → गिरफ्तारी से पहले कस्टडी: रेगुलर बेल → आरोपी पहले से ही कस्टडी में है एंटीसिपेटरी बेल → आरोपी आज़ाद है मकसद: रेगुलर बेल → जेल/पुलिस कस्टडी से रिहाई एंटीसिपेटरी बेल → गिरफ्तारी से बचाव नेचर: रेगुलर बेल → आमतौर पर गिरफ्तार होने के बाद दी जाती है एंटीसिपेटरी बेल → डिस्क्रिशनरी और प्रिवेंटिव रिलीफ दोनों में कोर्ट के विचार: अपराध का नेचर आरोपी के खिलाफ सबूत फरार होने की संभावना गवाहों को प्रभावित करने का रिस्क निष्कर्ष: रेगुलर बेल गिरफ्तारी के बाद रिहाई के लिए है, जबकि एंटीसिपेटरी बेल गिरफ्तारी होने से पहले उससे सुरक्षा है।