Law4u - Made in India

क्या किसी घोषित अपराधी को अग्रिम ज़मानत दी जा सकती है?

Answer By law4u team

भारतीय कानून के तहत घोषित अपराधी या भगोड़े अपराधी को लेकर अग्रिम ज़मानत के प्रावधान काफी सख्त हैं। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 438 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत अग्रिम ज़मानत केवल उन व्यक्तियों को दी जाती है जो गंभीर आशंका में हैं कि उन्हें किसी गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है। लेकिन जब किसी अदालत द्वारा किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से घोषित अपराधी घोषित कर दिया जाता है, तो कानून की स्थिति पूरी तरह से बदल जाती है। सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ CrPC की धारा 82 या नए कानून BNSS के तहत उद्घोषणा जारी कर दी गई है या उसे घोषित अपराधी मान लिया गया है, तो सामान्यतः उसे अग्रिम ज़मानत का लाभ नहीं दिया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि घोषित अपराधी वह व्यक्ति होता है जो अदालत की प्रक्रिया से भाग रहा होता है और कानून के समक्ष आत्मसमर्पण करने से बच रहा होता है। अग्रिम ज़मानत का उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को पुलिस उत्पीड़न या मनमाने ढंग से गिरफ्तारी से बचाना है, न कि उस व्यक्ति को बचाना जो अदालत के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना कर रहा है और फरार चल रहा है। जब कोई व्यक्ति फरार हो जाता है और अदालत उसे भगोड़ा घोषित कर देती है, तो उसे न्याय प्रणाली का सहयोग न करने वाला माना जाता है। ऐसे मामलों में अदालतें यह मानती हैं कि जो व्यक्ति अदालत के समन या वारंट का सम्मान नहीं कर रहा है, वह अग्रिम ज़मानत जैसी विवेकाधीन राहत पाने का अधिकारी नहीं है। यदि ऐसा व्यक्ति अग्रिम ज़मानत की मांग करता है, तो अदालतें आमतौर पर उसकी याचिका को इस आधार पर खारिज कर देती हैं कि वह कानूनी प्रक्रिया से भाग रहा है। हालांकि, कानून में कुछ अत्यंत दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियां हो सकती हैं जहां अदालतें थोड़ी नरमी बरत सकती हैं, लेकिन यह नियम का अपवाद मात्र होता है। यदि कोई घोषित अपराधी यह साबित कर दे कि उसे जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण तरीके से भगोड़ा घोषित किया गया था, या उसे समन/वारंट की कभी कोई वास्तविक जानकारी नहीं मिली थी, और जैसे ही उसे पता चला, उसने तुरंत अदालत के समक्ष आने की इच्छा जताई, तो उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट अपने असाधारण अधिकारों का उपयोग करके कुछ राहत दे सकते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया बेहद कठिन है और इसके लिए मजबूत सबूतों की आवश्यकता होती है। यदि किसी व्यक्ति को घोषित अपराधी घोषित कर दिया गया है, तो उसके लिए सबसे उचित कानूनी उपाय यह होता है कि वह अग्रिम ज़मानत के चक्कर में पड़ने के बजाय संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करे और नियमित ज़मानत यानी रेगुलर बेल के लिए आवेदन करे। नियमित ज़मानत याचिका दाखिल करते समय उसे अदालत को यह विश्वास दिलाना होता है कि उसकी अनुपस्थिति जानबूझकर नहीं थी और वह मामले की जांच में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार है। अदालत सभी तथ्यों और अपराध की गंभीरता को देखते हुए नियमित ज़मानत पर विचार कर सकती है। संक्षेप में, सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से एक घोषित अपराधी को अग्रिम ज़मानत मिलना लगभग असंभव है जब तक कि वह अदालत के समक्ष शारीरिक रूप से उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट न कर दे। कानून भगोड़ों को अग्रिम सुरक्षा प्रदान नहीं करता है क्योंकि अग्रिम ज़मानत केवल उन लोगों के लिए है जो जांच में सहयोग करना चाहते हैं लेकिन गिरफ्तारी के डर से परेशान हैं, जबकि घोषित अपराधी कानूनी प्रक्रिया से ही बाहर हो चुका होता है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति इस स्थिति में है, तो उसे किसी अच्छे क्रिमिनल वकील की सलाह लेकर तुरंत अदालत में आत्मसमर्पण करने और नियमित जमानत के रास्ते पर आगे बढ़ने की कानूनी सलाह दी जाती है।

अग्रिम जमानत Verified Advocates

Get expert legal advice instantly.

Advocate Anil Kumar Jain

Advocate Anil Kumar Jain

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Cyber Crime, Domestic Violence, Criminal

Get Advice
Advocate Aruna Gaddam

Advocate Aruna Gaddam

Divorce, Domestic Violence, Family, Documentation, Cheque Bounce

Get Advice
Advocate Ramit Kehar

Advocate Ramit Kehar

Anticipatory Bail, Breach of Contract, Civil, Cheque Bounce, Court Marriage, Criminal, Divorce, Domestic Violence, Family

Get Advice
Advocate Aditya Vikram Tiwari

Advocate Aditya Vikram Tiwari

Banking & Finance, Recovery, Civil, Property, Revenue

Get Advice
Advocate Vivek Prakash Singh

Advocate Vivek Prakash Singh

Civil, Child Custody, Anticipatory Bail, Criminal, Family, Divorce, Breach of Contract, Cheque Bounce

Get Advice
Advocate Ch Venkateswara Chary

Advocate Ch Venkateswara Chary

Cheque Bounce, Labour & Service, Motor Accident, Revenue, Criminal

Get Advice
Advocate Anuj Kumar Singh

Advocate Anuj Kumar Singh

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Child Custody, Consumer Court, Court Marriage, Criminal, Divorce, Documentation, Domestic Violence, Family, High Court, Motor Accident, R.T.I, Recovery, Succession Certificate, Revenue

Get Advice
Advocate Dinesh Singh

Advocate Dinesh Singh

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Criminal, Domestic Violence, Family

Get Advice
Advocate Dharmendra Jaiswal

Advocate Dharmendra Jaiswal

Cheque Bounce, Civil, Consumer Court, Corporate, Property

Get Advice
Advocate Jignesh Puri

Advocate Jignesh Puri

Cheque Bounce,Civil,Criminal,Family,High Court,Revenue

Get Advice

अग्रिम जमानत Related Questions

Discover clear and detailed answers to common questions about Breach of Contract. Learn about procedures and more in straightforward language.