Answer By law4u team
भारतीय कानून के तहत साइबर क्राइम के मामलों में सही और पुख्ता सबूतों का होना बहुत जरूरी है ताकि अदालत में आरोपी को सजा दिलाई जा सके या पीड़ित को न्याय मिल सके। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार डिजिटल साक्ष्य की अपनी एक विशेष कानूनी मान्यता होती है। साइबर अपराध वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, ऑनलाइन उत्पीड़न, या हैकिंग जैसे कई रूपों में हो सकते हैं, और हर प्रकार के अपराध के लिए अलग-अलग तरह के डिजिटल सबूत जुटाने पड़ते हैं। 1. सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण सबूत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड होता है, जिसमें कंप्यूटर, स्मार्टफोन, या किसी अन्य डिजिटल डिवाइस से प्राप्त डेटा शामिल है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को अदालत में पेश करने के लिए एक विशेष प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है, जिसे सेक्शन 65बी सर्टिफिकेट कहा जाता है। इस प्रमाण पत्र के बिना कंप्यूटर या मोबाइल से निकाला गया कोई भी डिजिटल प्रिंटआउट या स्क्रीनशॉट अदालत में मुख्य सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है। इसलिए किसी भी डिजिटल सबूत को संरक्षित करते वक्त इस बात का ध्यान रखना अनिवार्य है कि उस डिवाइस से जुड़े सभी तकनीकी पहलुओं का दस्तावेजीकरण सही तरीके से किया जाए। 2. वित्तीय धोखाधड़ी या ऑनलाइन बैंक फ्रॉड के मामलों में बैंक स्टेटमेंट, ट्रांजैक्शन आईडी, यूपीआई रेफरेंस नंबर, क्रेडिट या डेबिट कार्ड की डिटेल, और उस खाते की जानकारी सबसे बड़े सबूत होते हैं जहां पैसे ट्रांसफर किए गए हैं। इसके अलावा पीड़ित के मोबाइल पर आए वे एसएमएस या बैंक अलर्ट भी बहुत महत्वपूर्ण हैं जो अनधिकृत लेन-देन की पुष्टि करते हैं। साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराते समय इन सभी ट्रांजैक्शन के स्क्रीनशॉट और बैंक से प्राप्त आधिकारिक स्टेटमेंट को संलग्न करना चाहिए ताकि यह साबित किया जा सके कि पीड़ित के खाते से बिना उसकी सहमति के पैसे निकाले गए हैं। 3. सोशल मीडिया उत्पीड़न, साइबर बुलिंग, मानहानि, या ऑनलाइन ठगी के मामलों में चैट के स्क्रीनशॉट, ईमेल के हेडर, फर्जी प्रोफाइल के लिंक, और ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग मुख्य सबूत बनते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम या टेलीग्राम पर की गई बातचीत के स्क्रीनशॉट लेते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसमें चैट का समय, तारीख और सामने वाले यूजर का प्रोफाइल नेम या फोन नंबर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा हो। इसके अलावा यदि कोई धमकी भरा या फर्जी ईमेल आया है, तो उसका रॉ डेटा या ईमेल हेडर निकलवाना जरूरी होता है, क्योंकि इसी हेडर से भेजने वाले के असली आईपी एड्रेस और सर्वर की लोकेशन का पता लगाया जाता है। 4. आईपी एड्रेस और सर्वर लॉग्स तकनीकी सबूतों की श्रेणी में आते हैं। जब भी कोई व्यक्ति इंटरनेट का उपयोग करके किसी वेबसाइट को एक्सेस करता है या किसी सर्वर पर डेटा अपलोड या डाउनलोड करता है, तो इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) के पास उस गतिविधि का डिजिटल निशान यानी लॉग फाइल सुरक्षित रहती है। पुलिस या जांच एजेंसियां इन आईपी लॉग्स को प्राप्त करने के लिए सेवा प्रदाताओं को नोटिस भेजती हैं, और ये लॉग्स इस बात का अकाट्य सबूत होते हैं कि किस समय किस कंप्यूटर या नेटवर्क से अपराध को अंजाम दिया गया था। 5. कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और लोकेशनल डेटा भी साइबर क्राइम की जांच में अहम भूमिका निभाते हैं, खासकर तब जब मामला ब्लैकमेलिंग, फिरौती या फर्जी सिम कार्ड के जरिए धोखाधड़ी से जुड़ा हो। मोबाइल ऑपरेटरों से प्राप्त ये रिकॉर्ड यह साबित करने में मदद करते हैं कि अपराध के समय आरोपी किस स्थान पर मौजूद था और उसने किस फोन नंबर का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट भी बहुत जरूरी होती है, जिसमें किसी जब्त किए गए फोन या लैपटॉप की हार्ड डिस्क की क्लोनिंग करके यह पता लगाया जाता है कि उसमें से कोई डेटा डिलीट तो नहीं किया गया है या किसी मैलवेयर का इस्तेमाल किया गया था या नहीं। 6. अंत में यह ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि साइबर क्राइम की शिकायत मिलने पर तुरंत नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए या नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज करानी चाहिए। जितनी जल्दी सबूतों को सुरक्षित किया जाएगा, उतनी ही मजबूती से जांच एजेंसी अदालत में अपना पक्ष रख सकेगी। किसी भी सबूत के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए और डिजिटल उपकरणों को बिना फॉरेंसिक जांच के रीसेट या फॉर्मेट करने से बचना चाहिए ताकि कोई भी महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य नष्ट न हो सके।