Answer By law4u team
भारतीय कानून के तहत बच्चों और किशोरों के मामलों से निपटने के लिए एक विशेष और बेहद संवेदनशील व्यवस्था बनाई गई है। आपके प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि किसी भी नाबालिग यानी ऐसे व्यक्ति की जिसकी आयु अपराध करते समय अठारह वर्ष से कम थी, उसे देश की सामान्य जेलों या वयस्कों के साथ बंदी गृहों में नहीं भेजा जा सकता है। इसके लिए किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम (JJ Act) बनाया गया है, जो इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करता है कि बाल अपराधियों को सुधार के अवसर मिलें न कि उन्हें वयस्क अपराधियों की तरह कठोर दंड दिया जाए। जब भी किसी नाबालिग पर कोई गंभीर आरोप लगता है या उसे किसी संज्ञेय अपराध में पकड़ा जाता है, तो उसे आपराधिक न्याय प्रणाली के तहत सामान्य अदालतों में पेश नहीं किया जाता, बल्कि उसे विशेष रूप से गठित किशोर न्याय बोर्ड (JJ Board) के समक्ष पेश करना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। सामान्य जेलों के विपरीत, किशोरों को सुरक्षित स्थानों या विशेष गृहों में रखा जाता है जहाँ उनका शारीरिक और मानसिक विकास सकारात्मक दिशा में हो सके। किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के प्रावधानों के अनुसार, कानून में नाबालिगों की आयु और उनके द्वारा किए गए कृत्य की गंभीरता के आधार पर स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है। यदि किसी ऐसे बच्चे ने जिसकी आयु सोलह वर्ष से कम है, कोई भी अपराध किया है, तो उसे किसी भी परिस्थिति में वयस्क मानकर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। ऐसे बच्चों के लिए कानून पूरी तरह से सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है और उन्हें अधिकतम तीन वर्ष की अवधि के लिए किसी विशेष गृह में रखने का आदेश दिया जा सकता है, जिसके दौरान उनकी काउंसलिंग, शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था की जाती है ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। हालांकि, कानून में हाल ही में किए गए संशोधनों के माध्यम से यह प्रावधान भी जोड़ा गया है कि यदि कोई किशोर जिसकी आयु सोलह वर्ष से अठारह वर्ष के बीच है, उसने कोई अत्यंत गंभीर या जघन्य अपराध किया है, तो किशोर न्याय बोर्ड सबसे पहले यह आकलन करता है कि क्या उस बच्चे में इतनी मानसिक और बौद्धिक परिपक्वता थी कि वह अपराध की गंभीरता को समझ सके। इस मानसिक और सामाजिक मूल्यांकन के बाद यदि किशोर न्याय बोर्ड इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस सोलह से अठारह वर्ष के किशोर ने वयस्क की तरह समझदारी के साथ अपराध किया है, तो बोर्ड उस मामले को विशेष रूप से नामित बच्चों की अदालत यानी Children's Court में स्थानांतरित कर सकता है। ऐसे विशेष मामलों में भी कानून यह स्पष्ट रूप से आदेश देता है कि उस किशोर को सामान्य वयस्क जेल में नहीं भेजा जाएगा, बल्कि उसे किसी सुरक्षित स्थान पर तब तक रखा जाएगा जब तक कि वह इक्कीस वर्ष की आयु का नहीं हो जाता। इसके बाद भी, यदि उस पर लगाए गए आरोप साबित होते हैं और अदालत को लगता है कि उसे सजा देना आवश्यक है, तो उसे किसी सुधारात्मक सुविधा में ही रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का मूल उद्देश्य यह होता है कि कारावास के नकारात्मक प्रभावों से बच्चे को दूर रखा जाए और आपराधिक प्रवृत्ति को रोकने के लिए बाल मनोवैज्ञानिकों और समाज कल्याण अधिकारियों की मदद से उनके सुधार पर पूरा ध्यान केंद्रित किया जाए। इसके अतिरिक्त, भारतीय संविधान और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत भी बाल अधिकारों की विशेष रूप से रक्षा की जाती है। पुलिस को भी यह सख्त निर्देश होते हैं कि जब वे किसी नाबालिग को हिरासत में लें, तो वे किसी भी प्रकार की वर्दी का प्रयोग न करें और न ही उसे हथकड़ी लगाएं, ताकि बच्चे पर किसी प्रकार का मानसिक दबाव या खौफ न पड़े। हिरासत में लेने के तुरंत बाद बच्चे को बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के पास ले जाना होता है और चौबीस घंटे के भीतर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। पुलिस थाने में भी नाबालिगों के साथ बहुत ही संवेदनशील व्यवहार किया जाता है। यदि माता-पिता या अभिभावक उपलब्ध हैं, तो उन्हें तुरंत सूचित किया जाता है। इसलिए, भारतीय कानून के तहत नाबालिगों को कभी भी पारंपरिक जेलों में नहीं भेजा जाता है, बल्कि उन्हें एक सुधारवादी और बाल-अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाता है ताकि वे अपने जीवन को सुधार सकें।