Answer By law4u team
भारत में साइबर अपराधों के मामले में न्याय और कानून की स्थिति बहुत स्पष्ट है, और नाबालिगों यानी किशोरों के संबंध में विधि का संचालन किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 यानी Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 के प्रावधानों के तहत किया जाता है। जब कोई नाबालिग साइबर अपराध करता है, जैसे कि ऑनलाइन फ्रॉड, डेटा चोरी, किसी की पहचान चुराना यानी आइडेंटिटी थेफ्ट, सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक या अश्लील सामग्री साझा करना, किसी को साइबर बुलिंग या प्रताड़ित करना, या मालवेयर और वायरस फैलाना, तो सामान्य अदालतों में वयस्कों की तरह उन पर मुकदमा नहीं चलाया जाता है। इसके बजाय, उनके मामलों की सुनवाई विशेष अदालतों यानी किशोर न्याय बोर्ड यानी Juvenile Justice Board (JJB) के समक्ष की जाती है, जहाँ बच्चों के सुधार और पुनर्वास पर मुख्य जोर दिया जाता है। भारतीय कानून के अंतर्गत, किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी उसकी उम्र पर निर्भर करती है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 यानी Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) की धारा 20 और पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता यानी Indian Penal Code (IPC) की धारा 82 के अनुसार, सात वर्ष से कम उम्र के बच्चे का कोई भी कार्य अपराध नहीं होता है, क्योंकि इस उम्र के बच्चे में समझ या परिपक्वता का पूर्ण अभाव माना जाता है। इसके बाद, सात वर्ष से अधिक और बारह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के मामले में यह देखा जाता है कि क्या उस बच्चे में पर्याप्त समझ विकसित हुई थी या नहीं कि वह अपने कार्य की प्रकृति और परिणाम को समझ सके। लेकिन साइबर अपराधों के संदर्भ में, जो बच्चे आम तौर पर तेरह से अट्ठारह वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं, उनके संबंध में किशोर न्याय अधिनियम लागू होता है। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत, सोलह से अठारह वर्ष की आयु के किशोरों के संबंध में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और कठोर नियम जोड़ा गया है। यदि इस आयु वर्ग का कोई किशोर किसी गंभीर या जघन्य अपराध यानी heinous offence को अंजाम देता है, तो किशोर न्याय बोर्ड सबसे पहले यह प्रारंभिक मूल्यांकन यानी preliminary assessment करता है कि क्या उस किशोर की मानसिक और शारीरिक क्षमता ऐसी थी कि वह अपराध को समझ सके और क्या उसने इसे एक वयस्क की तरह किया था। इस मूल्यांकन के लिए बाल मनोवैज्ञानिकों और समाज कल्याण विशेषज्ञों की मदद ली जाती है। यदि बोर्ड यह पाता है कि अपराध अत्यंत गंभीर था और किशोर की मानसिक स्थिति एक वयस्क जैसी थी, तो मामले को बाल अदालत यानी Children's Court में स्थानांतरित किया जा सकता है, जहाँ उस पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है और यदि दोषी पाया जाता है, तो कानून के अनुसार उचित दंड दिया जा सकता है, हालांकि इसमें भी मृत्यु आजीवन कारावास जैसी अत्यंत कठोर सजाओं पर कुछ सुरक्षात्मक प्रतिबंध और अपवाद मौजूद रहते हैं। दूसरी ओर, यदि कोई किशोर सोलह वर्ष से कम आयु का है, या फिर सोलह से अठारह वर्ष की आयु के बीच का होने के बावजूद बोर्ड उसके मामले को बाल अदालत में भेजने का निर्णय नहीं लेता है, तो उसे किसी भी स्थिति में जेल या वयस्क कारागार में नहीं भेजा जा सकता है। ऐसे मामलों में अधिकतम सजा के रूप में किशोर को किसी विशेष गृह यानी Special Home में भेजा जा सकता है जहाँ उसकी काउंसलिंग, शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था होती है ताकि वह समाज की मुख्यधारा में सुधार के साथ लौट सके। इस अवधि की अधिकतम सीमा सामान्यतः तीन वर्ष से अधिक नहीं हो सकती है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 यानी Information Technology Act, 2000 के अंतर्गत आने वाले साइबर अपराधों के लिए भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है, क्योंकि विशेष कानून हमेशा सामान्य या विशेष न्याय प्रणाली के दायरे में ही किशोरों पर लागू होते हैं। माता-पिता या अभिभावकों की भूमिका और देयता भी साइबर अपराधों के मामलों में विचारणीय होती है। यदि कोई नाबालिग अपने माता-पिता के लैपटॉप, कंप्यूटर या बैंक खातों का उपयोग करके साइबर अपराध करता है, तो हालांकि आपराधिक दायित्व सीधे तौर पर बच्चे पर ही आता है, लेकिन यदि यह साबित होता है कि माता-पिता की घोर लापरवाही या उपेक्षा के कारण बच्चा ऐसा करने में सफल रहा, तो सिविल मामलों में हर्जाने या अन्य कानूनी जटिलताओं का सामना माता-पिता को भी करना पड़ सकता है। अंत में, यह समझना आवश्यक है कि भारत में कानून नाबालिगों को दंडित करने के बजाय उन्हें सुधारने और उनकी काउंसलिंग करने के सिद्धांत पर काम करता है, ताकि डिजिटल युग में बच्चे गलत रास्ते पर जाने से बचें और यदि वे गलती करते भी हैं, तो उन्हें एक बेहतर नागरिक बनाने का अवसर प्रदान किया जा सके।