Answer By law4u team
क्रिमिनल केस में विक्टिम को मुआवजा यानी कम्पेनसेशन पाने का कानूनी अधिकार होता है और इसके लिए भारतीय न्याय प्रणालियों में कई प्रावधान किए गए हैं। आपराधिक मामलों में पीड़ित व्यक्ति केवल आरोपी को सजा दिलवाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे हुए आर्थिक, शारीरिक और मानसिक नुकसान की भरपाई पाने का भी पूरा हक होता है। क्रिमिनल केस के दौरान या उसके बाद विक्टिम कैसे कम्पेनसेशन मांग सकता है, इसके लिए निम्नलिखित कानूनी रास्ते और प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। 1. कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की धारा 357 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के संबंधित प्रावधान के तहत ट्रायल कोर्ट में आवेदन देकर कम्पेनसेशन की मांग की जा सकती है। जब अदालत किसी आरोपी को दोषी करार देती है और सजा सुनाती है, तब अदालत अपने फैसले में यह आदेश दे सकती है कि आरोपी विक्टिम को एक निश्चित राशि बतौर मुआवजा दे। यह मुआवजा उस जुर्माने की राशि से दिया जा सकता है जो अदालत ने आरोपी पर लगाया है। इसके अलावा, यदि किसी ऐसे मामले में जिसमें जुर्माना अनिवार्य नहीं है, अदालत दोषी को विक्टिम को मुआवजा देने का निर्देश दे सकती है ताकि उसे हुए नुकसान या चोट की भरपाई की जा सके। 2. CrPC की धारा 357A या BNSS के तहत राज्य सरकार द्वारा स्थापित विक्टिम कम्पेनसेशन स्कीम का लाभ उठाया जा सकता है। कई बार ऐसा होता है कि आरोपी बरी हो जाता है, या आरोपी का पता नहीं चलता, या आरोपी के पास मुआवजा देने के लिए पैसे नहीं होते, लेकिन फिर भी विक्टिम को गंभीर चोट या नुकसान पहुंचा है। ऐसे मामलों में विक्टिम या उसके आश्रित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के समक्ष मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को एक लिखित प्रार्थना पत्र देना होता है, जिसमें घटना का विवरण और नुकसान की जानकारी दी जाती है। इसके बाद अदालत या प्राधिकरण मामले की जांच करके राज्य कोष से पीड़ित को मुआवजा मंजूर करती है। 3. आपराधिक मामले के ट्रायल के दौरान ही पीड़ित पक्ष अपने वकील के माध्यम से अदालत में एक आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। इस आवेदन में यह गुहार लगाई जाती है कि यदि आरोपी को दोषी पाया जाता है, तो उसे न्याय के हित में पीड़ित को हुई चिकित्सा लागत, संपत्ति के नुकसान, आय की हानि और मानसिक पीड़ा के एवज में उचित मुआवजा देने का निर्देश दिया जाए। ट्रायल जज इस आवेदन पर विचार करते हैं और साक्ष्यों के आधार पर सजा के साथ-साथ मुआवजे का आदेश भी पारित करते हैं। 4. महिलाओं के खिलाफ अपराधों, जैसे कि एसिड अटैक, बलात्कार, घरेलू हिंसा, या अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के सख्त दिशा-निर्देशों के तहत तत्काल अंतरिम मुआवजे (interim compensation) की मांग की जा सकती है। इसके लिए विक्टिम महिला मजिस्ट्रेट के समक्ष या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से आवेदन कर सकती है, ताकि मुकदमे के फैसले का लंबा इंतजार किए बिना तुरंत चिकित्सीय और वित्तीय सहायता प्राप्त हो सके। 5. यदि आपराधिक मामला सेशन कोर्ट या मजिस्ट्रेट की अदालत में चल रहा है, तो पीड़ित व्यक्ति अपनी गवाही के दौरान या बहस के चरण में अपने वकील के जरिए अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित कर सकता है कि उसे अपराध के कारण कितना भारी आर्थिक और शारीरिक नुकसान उठाना पड़ा है। कोर्ट को यह समझाने के लिए मेडिकल रिपोर्ट्स, बिल, अस्पताल के खर्चे, संपत्ति के नुकसान के दस्तावेज और आय के नुकसान से जुड़े प्रमाण सबूत के तौर पर अदालत में पेश करने चाहिए। ये दस्तावेज अदालत को यह तय करने में मदद करते हैं कि मुआवजे की वास्तविक राशि कितनी होनी चाहिए। 6. अपील के चरण में भी यदि ट्रायल कोर्ट ने मुआवजे का आदेश देने में गलती की है या अपर्याप्त मुआवजा दिया है, तो पीड़ित व्यक्ति उच्च न्यायालय (High Court) में अपील या रिवीजन याचिका दायर करके मुआवजे की राशि बढ़ाने की मांग कर सकता है। आपराधिक न्याय प्रणाली में विक्टिम के अधिकारों को अब बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, इसलिए कानून में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि न्याय केवल सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित का पुनर्वास और उसे आर्थिक राहत पहुंचाना भी न्याय का एक अनिवार्य हिस्सा है।