Answer By law4u team
घरेलू हिंसा के मामलों में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दिए जाने का प्रावधान भारतीय कानून में किस प्रकार लागू होता है, इसे समझने के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure, 1973 - CrPC) या उसकी जगह आए नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) तथा महिलाओं के संरक्षण से जुड़े विशेष अधिनियमों की कानूनी स्थिति को विस्तार से देखना होगा। घरेलू हिंसा के मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या आरोपी व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिए पहले ही अदालत से अग्रिम जमानत मांग सकता है या नहीं, क्योंकि इस प्रकार के मामलों में पति और उसके परिवार के सदस्यों को अक्सर नामजद किया जाता है। 1. घरेलू हिंसा अधिनियम की दीवानी प्रकृति और आपराधिक मामले: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 - DV Act) मुख्य रूप से एक दीवानी (Civil) प्रकृति का कानून है। इसके तहत मजिस्ट्रेट द्वारा महिलाओं को सुरक्षा आदेश, निवास आदेश या मौद्रिक राहत दी जाती है। चूंकि इस अधिनियम के तहत दी जाने वाली राहतें मुख्य रूप से दीवानी प्रकृति की होती हैं, इसलिए इस अधिनियम के तहत सीधे तौर पर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का प्रावधान नहीं होता है और न ही इस विशेष कानून के तहत अग्रिम जमानत की आवश्यकता पड़ती है। 2. भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत आपराधिक मामले: व्यवहार में यह देखा जाता है कि घरेलू हिंसा की शिकायत करने वाली महिलाएं केवल DV Act का सहारा नहीं लेती हैं, बल्कि वे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code, 1860 - IPC) की धारा 498A (जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 - BNS की धारा 85 के अंतर्गत आती है) के तहत पुलिस में आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराती हैं। BNS Section 85 (या पूर्ववर्ती IPC Section 494 या 498A) पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता करने से संबंधित है। यह अपराध एक संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध है। चूंकि यह एक गैर-जमानती अपराध है, इसलिए इसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और ऐसे मामलों में ही अग्रिम जमानत का प्रश्न उत्पन्न होता है। 3. अग्रिम जमानत का कानूनी प्रावधान: CrPC Section 438 या BNSS Section 482 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को, जिसे यह आशंका हो कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है, वह सत्र न्यायालय (Sessions Court) या उच्च न्यायालय (High Court) में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। चूंकि BNS Section 85 के तहत दर्ज मामला गैर-जमानती है, इसलिए आरोपी व्यक्ति घरेलू हिंसा के इस आपराधिक पहलू से बचने के लिए अग्रिम जमानत की अर्जी लगा सकता है। 4. अदालतों का दृष्टिकोण और दिशानिर्देश: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण मामलों में यह स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा और BNS Section 85 (या IPC Section 498A) के मामलों में केवल नाम आ जाने मात्र से सभी रिश्तेदारों को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के अनुसार, 7 वर्ष से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी से पहले CrPC Section 41A (अब BNSS Section 35) के तहत नोटिस देना आवश्यक होता है। इसके बावजूद, यदि पुलिस गिरफ्तारी की आशंका बनाती है, तो अदालतें अग्रिम जमानत पर विचार करती हैं। 5. अग्रिम जमानत देते समय अदालत द्वारा देखे जाने वाले कारक: जब कोई अदालत घरेलू हिंसा या क्रूरता के मामले में अग्रिम जमानत की याचिका पर सुनवाई करती है, तो वह निम्नलिखित बातों का गहराई से परीक्षण करती है। पहला यह कि क्या आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर प्रकृति के हैं या केवल बदला लेने की भावना से सभी रिश्तेदारों को फंसाया गया है। दूसरा यह कि क्या आरोपी जांच में सहयोग करने के लिए तैयार है या नहीं। तीसरा यह कि क्या आरोपी के भागने की कोई संभावना है या वह साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है। यदि अदालत को लगता है कि मामला सामान्य पारिवारिक विवाद का है और अति-उत्साह में दूर के रिश्तेदारों को भी लपेट लिया गया है, तो अदालत आमतौर पर अग्रिम जमानत मंजूर कर लेती है या कम से कम अंतरिम संरक्षण प्रदान कर देती है। 6. शर्तों के साथ जमानत: यदि अदालत घरेलू हिंसा के मामले में अग्रिम जमानत मंजूर करती है, तो वह सामान्यतः कुछ कड़ी शर्तें भी लगाती है। इनमें पुलिस थाने में निश्चित समय पर हाजिर होना, देश छोड़कर न जाना, और पीड़िता या उसके गवाहों को किसी भी प्रकार से धमकाना या प्रभावित न करना शामिल होता है। यदि इन शर्तों का उल्लंघन किया जाता है, तो अभियोजन पक्ष या पीड़िता जमानत को रद्द करने के लिए अदालत में आवेदन कर सकती है। संक्षेप में कहा जाए तो, यदि घरेलू हिंसा की शिकायत के साथ-साथ BNS Section 85 के अंतर्गत भी आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया है, तो अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया जा सकता है और अदालतें योग्यता के आधार पर इस पर विचार करके राहत प्रदान करती हैं।