Answer By law4u team
एंटीसिपेटरी बेल यानी अग्रिम जमानत सीआरपीसी (CrPC) की धारा 438 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत दी जाती है। जब अदालत किसी व्यक्ति को एंटीसिपेटरी बेल देती है, तो इसका मतलब यह होता है कि यदि पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो उसे तुरंत जमानत पर रिहा करना होगा। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल होता है कि इस अग्रिम जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद क्या कानूनी स्थिति बनती है। आमतौर पर अदालतें एंटीसिपेटरी बेल एक निश्चित अवधि के लिए देती हैं, जैसे कि चार्जशीट दाखिल होने तक, या जांच पूरी होने तक, या फिर कुछ मामलों में एक सीमित समय सीमा जैसे 60 या 90 दिनों के लिए। जब यह समय सीमा समाप्त हो जाती है या अदालत द्वारा तय की गई शर्त पूरी हो जाती है, तो अग्रिम जमानत का वह विशिष्ट आदेश भी प्रभावी नहीं रहता। जब एंटीसिपेटरी बेल की अवधि समाप्त हो जाती है, तो सबसे पहली बात यह होती है कि आरोपी व्यक्ति को नियमित जमानत यानी रेगुलर बेल के लिए आवेदन करना पड़ता है। यदि जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस ने अदालत में चार्जशीट (Charge sheet) दाखिल कर दी है, तो आरोपी को उस अदालत में पेश होना होता है जहां मामले की सुनवाई चल रही है। वहां उसे कोड ऑफ क्रिमिनल प्रक्रिया या नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों के तहत रेगुलर बेल (Regular bail) के लिए अर्जी लगानी होती है। जब तक नियमित जमानत मंजूर नहीं हो जाती, तब तक पुलिस के पास आरोपी को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार फिर से आ जाता है, क्योंकि पुरानी अग्रिम जमानत की मियाद अब खत्म हो चुकी होती है। यदि एंटीसिपेटरी बेल खत्म होने के बाद आरोपी व्यक्ति समय पर रेगुलर बेल के लिए आवेदन नहीं करता है या अदालत में पेश नहीं होता है, तो जांच अधिकारी यानी Investigating Officer (IO) के पास यह अधिकार होता है कि वह उसे गिरफ्तार करे। इसके अलावा, यदि आरोपी लगातार अदालत की पेशियों से गायब रहता है और जांच में सहयोग नहीं करता है, तो पुलिस अदालत से गैर-जमानती वारंट यानी Non-Bailable Warrant (NBW) जारी करने का अनुरोध कर सकती है। यदि आरोपी इसके बाद भी अदालत या पुलिस के सामने पेश नहीं होता, तो अदालत सीआरपीसी या बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत उसे भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकती है, जिसे क्रिमिनल प्रोसीजर में प्रोक्लेमेशन (Proclamation) कहा जाता है। एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि कई बार अग्रिम जमानत के आदेश में कुछ शर्तें जुड़ी होती हैं, जैसे कि हर हफ्ते पुलिस थाने में हाजिरी देना, देश छोड़कर न जाना, या सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करना। यदि आरोपी इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो अभियोजन पक्ष यानी पुलिस या शिकायतकर्ता अदालत में जाकर एंटीसिपेटरी बेल को रद्द करने की मांग कर सकता है। ऐसी स्थिति में समय पूरा होने से पहले ही अग्रिम जमानत खत्म मानी जाती है और अदालत आरोपी को हिरासत में लेने का आदेश दे सकती है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि अग्रिम जमानत देते समय अदालत ने जो आदेश पारित किया है, उसकी हर एक शर्त का कड़ाई से पालन किया जाए। यदि किसी मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है और आरोपी ने एंटीसिपेटरी बेल पर रहते हुए अपनी जांच में पूरा सहयोग किया है, तो आमतौर पर अदालतें रेगुलर बेल की अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करती हैं और पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए जमानत दे देती हैं। बशर्ते अपराध की प्रकृति बहुत गंभीर न हो और आरोपी के भागने या गवाहों को डराने का कोई जोखिम न हो। हालांकि यह पूरी तरह से उस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। संक्षेप में कहें तो एंटीसिपेटरी बेल खत्म होने के बाद गिरफ्तारी से मिलने वाला सुरक्षा कवच समाप्त हो जाता है और आरोपी को कानून की सामान्य प्रक्रिया के तहत नियमित जमानत प्राप्त करनी ही होती है ताकि वह कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रह सके।