Answer By law4u team
भारतीय कानून में पहचान की चोरी यानी आइडेंटिटी थेफ्ट और किसी अन्य व्यक्ति की नकली या फर्जी प्रोफाइल बनाने के संबंध में बहुत ही सख्त प्रावधान किए गए हैं। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी, डिजिटल पहचान, पासवर्ड, ईमेल आईडी या सोशल मीडिया प्रोफाइल का गलत इस्तेमाल करता है या किसी अन्य व्यक्ति के नाम से फर्जी खाता या प्रोफाइल बनाता है, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इसके लिए मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66सी के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या किसी अन्य विशिष्ट पहचान का बेईमानी से या धोखाधड़ी से उपयोग करता है, तो उसे पहचान की चोरी माना जाता है। इस अपराध के लिए दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है और साथ ही एक लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसके अलावा इसी अधिनियम की धारा 66डी के तहत यदि कोई व्यक्ति कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण का उपयोग करके धोखाधड़ी करता है, जिसमें प्रतिरूपण यानी किसी और रूप में खुद को पेश करना शामिल है, तो इसके लिए भी तीन साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत भी ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई की जाती है। यदि कोई व्यक्ति किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने या धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से नकली प्रोफाइल बनाता है, तो इसे धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र माना जाता है। BNS की धारा 318 और धारा 319 के अंतर्गत धोखाधड़ी और प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी के लिए अलग से सजा का प्रावधान है, जिसमें कारावास की अवधि सात साल तक बढ़ सकती है और आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी महिला की फर्जी प्रोफाइल बनाई जाती है या उसका पीछा किया जाता है या उसकी ऑनलाइन निजता का उल्लंघन किया जाता है, तो BNS की धारा 78 और धारा 79 के तहत महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने के लिए गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जा सकता है, जिसमें पहली बार के अपराध में तीन साल तक की सजा और दोबारा ऐसा करने पर पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। यदि किसी व्यक्ति के साथ पहचान की चोरी या फर्जी प्रोफाइल का मामला सामने आता है, तो उसे तुरंत सबसे पहले संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या वेबसाइट पर उस प्रोफाइल की रिपोर्ट करनी चाहिए और उसे ब्लॉक करवाना चाहिए। इसके बाद अपने नजदीकी पुलिस थाने में या राज्य के साइबर सेल में लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) और BNS के तहत साइबर अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए ऑनलाइन राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का भी उपयोग किया जा सकता है। पुलिस के लिए यह अनिवार्य होता है कि वे ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज करें और तकनीकी साक्ष्यों जैसे आईपी एड्रेस, चैट के स्क्रीनशॉट, लॉग फाइल्स और यूआरएल को सुरक्षित रखकर आरोपी की पहचान करें। अदालत में ऐसे मामलों को साबित करने के लिए डिजिटल साक्ष्यों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इन डिजिटल प्रमाणों को अदालत में स्वीकार किया जाता है, जिसके आधार पर अपराधियों को कड़ी सजा दिलाई जा सकती है।