Answer By law4u team
भारत में इंटरनेट यूज़र्स की साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के अधिकार मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) और डिजिटल डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act, 2023) के अंतर्गत सुरक्षित किए गए हैं। हर नागरिक को इंटरनेट का उपयोग करते समय सुरक्षित वातावरण पाने का मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का भी हिस्सा माना जाता है। इंटरनेट यूज़र्स के सबसे महत्वपूर्ण साइबर सेफ्टी अधिकारों की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है। 1. डिजिटल डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा का अधिकार। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP Act, 2023) के तहत हर यूज़र को यह अधिकार है कि उसका व्यक्तिगत डेटा पूरी सुरक्षा के साथ प्रोसेस किया जाए। जब भी कोई कंपनी या संस्था आपका डेटा एकत्र करती है, तो उसे उस डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कानूनी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है। यदि किसी कंपनी की लापरवाही से आपका डेटा लीक होता है या हैक होता है, तो आप उस संस्था के खिलाफ हर्जाने की मांग कर सकते हैं। 2. सहमति वापस लेने का अधिकार। डीपी डीपी एक्ट के अनुसार यूज़र को यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग करने के लिए दी गई सहमति को कभी भी वापस ले ले। सहमति वापस लेने की प्रक्रिया उतनी ही आसान होनी जितनी सहमति देने की थी। इसके बाद उस डेटा को तुरंत हटाना या नष्ट करना संबंधित प्लेटफॉर्म की कानूनी बाध्यता बन जाती है। 3. साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) के तहत किसी भी प्रकार के साइबर फ्रॉड, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग, फ़िशिंग, हैकिंग, या साइबर बुलिंग के शिकार होने पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का पूर्ण अधिकार है। यूज़र राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं। गंभीर मामलों में पुलिस के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और आईटी एक्ट की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य होता है। 4. अपमानजनक, अशील या फर्जी कंटेंट को हटवाने का अधिकार। यदि इंटरनेट पर किसी यूज़र के खिलाफ कोई अश्लील, मानहानिकारक, फर्जी या भ्रामक जानकारी फैलाई जाती है, तो उसे उस कंटेंट को हटवाने का अधिकार है। मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम, 2021 (IT Intermediary Guidelines, 2021) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी आपत्तिजनक या महिला सुरक्षा से जुड़े अवैध कंटेंट को शिकायत मिलने के तय समय के भीतर अपने प्लेटफ़ॉर्म से हटा दें। 5. वित्तीय धोखाधड़ी में त्वरित न्याय और मुआवजे का अधिकार। ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड, यूपीआई फ्रॉड या अनधिकृत ट्रांजैक्शन होने पर यूज़र को अपने बैंक और साइबर सेल को तुरंत सूचित करने का अधिकार है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि यूज़र समय रहते बैंक को सूचना देता है, तो डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी में उसके नुकसान की भरपाई बैंक या वित्तीय संस्थान द्वारा की जा सकती है, बशर्ते यूज़र की तरफ से कोई बड़ी लापरवाही न बरती गई हो। 6. राइट टू बी फॉरगॉटन यानी भुलाए जाने का अधिकार। डिजिटल स्पेस में यूज़र को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी पुरानी, अप्रासंगिक या अनावश्यक डिजिटल जानकारी को इंटरनेट सर्च इंजन और वेबसाइट्स से हटवा सके। हालांकि यह अधिकार कुछ कानूनी सीमाओं के अधीन है, लेकिन अपनी ऑनलाइन इमेज और डेटा को साफ रखने के लिए यूज़र इस अधिकार का दावा कर सकता है। 7. बाल सुरक्षा और डेटा संरक्षण का अधिकार। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। किसी भी 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिग के डेटा को बिना माता-पिता या अभिभावक की verifiable सहमति के प्रोसेस या ट्रैक नहीं किया जा सकता है। बच्चों की ऑनलाइन ट्रैकिंग, व्यवहारिक विज्ञापन या उनकी प्रोफ़ाइलिंग पर सख्त कानूनी रोक लगाई गई है ताकि वे साइबर अपराधियों के चंगुल से सुरक्षित रह सकें। 8. शिकायत निवारण का अधिकार। हर प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल मध्यस्थ के लिए भारत में एक ग्रीवांस ऑफिसर नियुक्त करना अनिवार्य किया गया है। यूज़र को यह अधिकार है कि वह अपनी किसी भी साइबर सुरक्षा समस्या या कंटेंट विवाद को सीधे उस अधिकारी के पास दर्ज कराएं। यदि ग्रीवांस ऑफिसर तय सीमा में समाधान नहीं करता है, तो यूज़र आईटी अपीलीय समिति या भारतीय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकता है। इस प्रकार, भारतीय कानून यूज़र्स को मजबूत डिजिटल सुरक्षा चक्र प्रदान करते हैं जिनका उद्देश्य नागरिकों की गोपनीयता और साइबर स्पेस में उनकी गरिमा की रक्षा करना है।