Answer By law4u team
भारत में छेड़छाड़ यानी महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न और शील भंग के मामलों से निपटने के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य विशेष कानूनों में बहुत सख्त प्रावधान किए गए हैं। छेड़छाड़ केवल एक सामाजिक बुराई नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) है, जिसमें पुलिस बिना वारंट के तुरंत गिरफ्तार कर सकती है। यदि किसी महिला के साथ सार्वजनिक स्थान पर, कार्यस्थल पर या किसी भी अन्य परिस्थिति में छेड़छाड़ की जाती है, तो पीड़िता या उसके परिवार द्वारा निम्नलिखित कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। 1. पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराना। सबसे पहले घटना के तुरंत बाद नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर लिखित या मौखिक शिकायत दी जानी चाहिए। पुलिस के लिए बीएनएस के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। यदि पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना करते हैं, तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154(3) या वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के संबंधित प्रावधानों के तहत पुलिस अधीक्षक (SP) या कमिश्नर को लिखित शिकायत भेजी जा सकती है। इसके अलावा, मजिस्ट्रेट के समक्ष अदालत में भी परिवाद दायर किया जा सकता है। 2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत लागू होने वाली धाराएं। छेड़छाड़ के मामलों में मुख्य रूप से BNS की धारा 74 का उपयोग किया जाता है, जो किसी महिला की लज्जा का अनादर करने के इरादे से उस पर आपराधिक बल के प्रयोग या हमले से संबंधित है। इस अपराध के लिए न्यूनतम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष तक के कारावास के साथ जुर्माने का प्रावधान है। यदि मामला पीछा करने (Stalking) का है, तो BNS की धारा 78 लागू होती है, जिसमें पहली बार के अपराध पर तीन साल तक की सजा और दोबारा ऐसा करने पर पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा, यदि किसी महिला की सहमति के बिना उसकी तस्वीरें खींची जाती हैं या उसे प्रसारित किया जाता है, तो यह गोपनीयता के हनन और शील भंग के दायरे में आता है जिसके लिए भी सख्त सजा तय की गई है। 3. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की स्थिति में कार्रवाई। यदि छेड़छाड़ किसी ऑफिस, संस्थान या कार्यस्थल पर की जाती है, तो महिला काम के दौरान महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत अपनी कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) के पास लिखित शिकायत दर्ज करा सकती है। इस अधिनियम के तहत प्रबंधन को तय समय सीमा के भीतर मामले की जांच करनी होती है और दोषी पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई से लेकर बर्खास्तगी तक के कदम उठाने होते हैं। 4. राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) या राज्य महिला आयोग में शिकायत। यदि स्थानीय पुलिस या प्रशासन उचित कार्रवाई नहीं करता है, तो पीड़िता राष्ट्रीय महिला आयोग या संबंधित राज्य महिला आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। महिला आयोग ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेता है और पुलिस प्रशासन को त्वरित कार्रवाई करने के लिए निर्देश जारी करता है। 5. कानूनी सहायता और सुरक्षा के अधिकार। आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान पीड़िता को अपनी पहचान गुप्त रखने का अधिकार होता है। भारतीय कानून के तहत अदालतें ऐसे मामलों की सुनवाई बंद कमरे में (In-camera trial) करा सकती हैं ताकि पीड़िता की निजता सुरक्षित रहे। इसके अलावा, पीड़िता को मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार भी है, जिसके लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से संपर्क किया जा सकता है ताकि बिना किसी खर्च के एक सक्षम वकील मिल सके जो अदालत में उसका पक्ष मजबूती से रख सके। छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को रोकने के लिए समाज में जागरूकता के साथ-साथ इन कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाना बेहद आवश्यक है ताकि अपराधियों में कानून का डर बना रहे और महिलाओं को एक सुरक्षित वातावरण मिल सके।