Answer By law4u team
भारत में एंटीसिपेटरी बेल या अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले हैं जो सीआरपीसी यानी Code of Criminal Procedure, 1973 की धारा 438 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत दिए गए हैं। एंटीसिपेटरी बेल के क्षेत्र में सबसे पहला और आधारभूत फैसला गुरुबख्श सिंह सिहाबिया बनाम पंजाब राज्य मामला है जो वर्ष 1980 में आया था। इस पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि अग्रिम जमानत का प्रावधान किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। इस फैसले के अनुसार अग्रिम जमानत का आदेश गिरफ्तारी से पहले दिया जा सकता है और यह आदेश किसी विशेष समय सीमा या एफआईआर दर्ज होने तक सीमित नहीं होना चाहिए जब तक कि अदालत विशेष शर्तें न लगाए। इसके अलावा यह भी तय किया गया कि अग्रिम जमानत देते समय अदालत को यह देखना चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया कोई गंभीर मामला बनता है और क्या आरोपी के भागने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोई संभावना है। दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुशीला अग्रवाल बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार मामला है जो वर्ष 2020 में पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा दिया गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सीआरपीसी Section 438 के तहत दी जाने वाली अग्रिम जमानत की कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी फैसला सुनाया कि अग्रिम जमानत किसी मुकदमे के निष्कर्ष तक या विचारण अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर मुकदमे की पूरी प्रक्रिया के दौरान भी जारी रह सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट या उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वे मामले की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत देते समय उचित शर्तें और समय सीमा तय कर सकते हैं, जैसे कि पुलिस जांच में सहयोग करना या देश छोड़कर न जाना। तीसरा प्रमुख फैसला अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामला है जो वर्ष 2014 में आया था। हालांकि यह मामला मुख्य रूप से गिरफ्तारी से सुरक्षा से संबंधित था, लेकिन इसका एंटीसिपेटरी बेल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से भारतीय दंड संहिता (IPC) Section 498A जैसे मामलों में पुलिस द्वारा अंधाधुंध गिरफ्तारियों पर रोक लगाई और यह निर्देश दिया कि जिन मामलों में सजा सात साल से कम की है, वहां पुलिस को सीआरपीसी Section 41A के तहत नोटिस देना अनिवार्य है। यदि गिरफ्तारी जरूरी समझी जाती है तो उसके लिए लिखित कारण दर्ज करने होंगे। इस फैसले के कारण निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों को अग्रिम जमानत देने में अधिक उदारता बरतने का निर्देश मिला क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। चौथा महत्वपूर्ण मामला सिद्दारम एम. म्हात्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य वर्ष 2011 का है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने के सिद्धांतों को विस्तार से समझाया। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है और किसी व्यक्ति को केवल इसलिए जेल में नहीं डाला जाना चाहिए क्योंकि पुलिस ऐसा चाहती है। इस फैसले में यह भी कहा गया कि अग्रिम जमानत देते समय अदालत को अपराध की प्रकृति, सामाजिक प्रभाव, आरोपी की पृष्ठभूमि और सबूत जुटाने में बाधा डालने की संभावनाओं का संतुलन बनाना चाहिए। इसके साथ ही भद्रेश कुमार बनाम गुजरात राज्य मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि अग्रिम जमानत देने के आवेदन पर विचार करते समय यह देखना आवश्यक है कि क्या आरोपी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करने की कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा तो नहीं है। इन सभी फैसलों का कुल मिलाकर यह सार है कि भारत में एंटीसिपेटरी बेल का उद्देश्य किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है, विशेष रूप से तब जब उसे झूठे या राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों में फंसाए जाने की आशंका हो। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत का अधिकार न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए है कि पुलिस या राज्य की मशीनरी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन न कर सके। यदि कोई व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करता है, तो उसे ऊपर बताए गए सुप्रीम कोर्ट के इन महत्वपूर्ण फैसलों के आधार पर अपनी याचिका तैयार करनी चाहिए और अदालत के समक्ष यह साबित करना चाहिए कि उसकी गिरफ्तारी से उसे अपूरणीय क्षति होगी और वह जांच में पूरी तरह सहयोग करने के लिए तैयार है।