Law4u - Made in India

भारत में क्रिमिनल केस के दौरान पीड़ितों के क्या अधिकार हैं?

04-Oct-2026
आपराधिक

Answer By law4u team

भारत में क्रिमिनल केस या आपराधिक मुकदमे के दौरान पीड़ितों के अधिकारों को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), और भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों के तहत बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ऐतिहासिक रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली मुख्य रूप से आरोपी और राज्य के बीच की लड़ाई मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ पीड़ितों के अधिकारों को मान्यता मिली है और उन्हें कानूनी प्रक्रिया में उचित स्थान दिया गया है। 1. पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराने और एफआईआर की कॉपी पाने का अधिकार। क्रिमिनल केस की शुरुआत में पीड़ित का सबसे पहला अधिकार यह है कि वह पुलिस थाने में संज्ञेय अपराध के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करा सके। यदि थाना प्रभारी एफआईआर दर्ज करने से मना करता है, तो पीड़ित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 (पूर्व में CrPC धारा 154) के तहत उच्च अधिकारियों जैसे पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत भेज सकता है। इसके अलावा, वह न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 (3) (पूर्व में CrPC धारा 156(3)) के तहत आवेदन देकर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की मांग कर सकता है। एफआईआर दर्ज होने के बाद पीड़ित को उसकी एक प्रति मुफ्त में पाने का कानूनी अधिकार है। 2. जांच के दौरान जानकारी पाने और सहयोग करने का अधिकार। आपराधिक मामले की जांच के दौरान पीड़ित को यह जानने का अधिकार है कि पुलिस जांच में क्या प्रगति हो रही है। पीड़ित जांच अधिकारी को प्रासंगिक दस्तावेज, साक्ष्य और गवाहों की जानकारी दे सकता है, जिसे पुलिस को ध्यान में रखना होता है। पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ित या उसके परिवार के सदस्यों को किसी प्रकार की धमकी न मिले। 3. मुफ्त कानूनी सहायता पाने का अधिकार। यदि पीड़ित आर्थिक रूप से कमजोर है या गरीबी रेखा से नीचे आता है, तो उसे कानूनी सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम के तहत मुफ्त वकील पाने का अधिकार है। इसके लिए पीड़ित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) में आवेदन कर सकता है ताकि अदालत में उसका पक्ष मजबूती से रखा जा सके और उसे न्याय मिलने में कोई वित्तीय बाधा न आए। 4. गवाही देने और अदालत की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार। मुकदमे के दौरान पीड़ित को अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह के रूप में अपनी गवाही दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। पीड़ित का वकील (जिसे प्राइवेट वकील या पीपी की सहायता के लिए नियुक्त वकील कहा जाता है) अदालत में बहस के दौरान अभियोजन पक्ष की सहायता कर सकता है। अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़ित को यह अधिकार है कि उसे मुकदमे की तारीखों और कोर्ट के फैसलों की सही जानकारी मिले। 5. विशेष सुरक्षा और गवाहों के संरक्षण का अधिकार। कई मामलों में, विशेषकर गंभीर अपराधों जैसे यौन उत्पीड़न, बलात्कार या जबरन वसूली के मामलों में, पीड़ित और गवाहों की सुरक्षा बेहद जरूरी होती है। भारतीय कानून के तहत गवाह सुरक्षा योजना (Witness Protection Scheme) के तहत पीड़ितों को पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाती है ताकि आरोपी या उसके सहयोगी पीड़ित को डरा-धमका न सकें या बयान बदलने के लिए मजबूर न कर सकें। 6. सुनवाई के दौरान उपस्थित रहने और अपना पक्ष रखने का अधिकार। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और न्यायिक निर्णयों के अनुसार, पीड़ित को आपराधिक मुकदमे के हर महत्वपूर्ण चरण पर अपनी बात रखने का अधिकार है। जब आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई होती है, तो पीड़ित या उसके वकील को भी अदालत में अपना विरोध दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। 7. मुआवजे (Compensation) का अधिकार। क्रिमिनल केस में सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक पीड़ित को मुआवजा मिलना है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 395 (पूर्व में CrPC धारा 357A) के तहत प्रत्येक राज्य सरकार को 'विक्टिम कंपनसेशन स्कीम' (Victim Compensation Scheme) चलानी होती है। इसके तहत यदि आरोपी बरी भी हो जाता है या अदालत सजा सुनाती है, तो भी अदालत पीड़ित या उसके आश्रितों को वित्तीय मुआवजा देने का आदेश दे सकती है। इसके अलावा, अदालत आरोपी पर लगाया गया जुर्माना सीधे तौर पर पीड़ित को दे सकती है ताकि उसे हुए शारीरिक और मानसिक नुकसान की भरपाई की जा सके। 8. अपील करने का अधिकार। यदि किसी क्रिमिनल केस में आरोपी को बरी कर दिया जाता है या उसे बहुत कम सजा दी जाती है, तो पीड़ित को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है। भारतीय कानून में किए गए संशोधनों के अनुसार पीड़ित को यह अधिकार है कि वह बिना राज्य सरकार की विशेष अनुमति के भी सीधे तौर पर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल कर सकता है। 9. सुनवाई के दौरान गरिमा और निजता का अधिकार। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। क्रिमिनल केस के दौरान, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के मामलों में, पीड़ित की पहचान को गुप्त रखने (जैसे कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता का नाम सार्वजनिक न करना) और अदालत की कार्यवाही बंद कमरे में (In-camera trial) चलाने का अधिकार होता है ताकि समाज में उसकी गरिमा बनी रहे और उसे किसी प्रकार के सामाजिक लांछन का सामना न करना पड़े। इन सभी अधिकारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में केवल आरोपी के मानवाधिकारों की रक्षा न हो, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को भी सम्मानजनक तरीके से न्याय मिले और अपराधी को उचित सजा के साथ-साथ पीड़ित को नुकसान की भरपाई भी हो सके।

आपराधिक Verified Advocates

Get expert legal advice instantly.

Advocate Sujeet Rajkumar Singh

Advocate Sujeet Rajkumar Singh

Anticipatory Bail, Arbitration, Child Custody, Cheque Bounce, Breach of Contract, Civil, Court Marriage, Cyber Crime, Divorce, Domestic Violence, Landlord & Tenant, Labour & Service, Family, Medical Negligence, Motor Accident, Media and Entertainment, Property, R.T.I, Recovery, RERA, Succession Certificate, Trademark & Copyright, Revenue

Get Advice
Advocate Nandu Khaire

Advocate Nandu Khaire

Anticipatory Bail, Arbitration, Banking & Finance, Bankruptcy & Insolvency, Cheque Bounce, Court Marriage, Child Custody, Civil, Breach of Contract, Criminal, Cyber Crime, Divorce, Documentation, Domestic Violence, Family, High Court, Muslim Law, Motor Accident, Medical Negligence, R.T.I, Recovery, Succession Certificate, Trademark & Copyright, Property

Get Advice
Advocate S R Muralidhar

Advocate S R Muralidhar

Anticipatory Bail, Arbitration, Bankruptcy & Insolvency, Breach of Contract, Cheque Bounce, Civil, Consumer Court, Court Marriage, Criminal, Divorce, Documentation, Domestic Violence, Family, High Court, Insurance, Landlord & Tenant, Medical Negligence, Muslim Law, Property, Recovery, Succession Certificate, Supreme Court, Revenue

Get Advice
Advocate Ashutosh Tripathi

Advocate Ashutosh Tripathi

Criminal, Cyber Crime, Labour & Service, Motor Accident, Insurance

Get Advice
Advocate Anil Bhuriya

Advocate Anil Bhuriya

Anticipatory Bail, Criminal, High Court, Cheque Bounce, Motor Accident

Get Advice
Advocate Harjeet Singh

Advocate Harjeet Singh

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Child Custody, Consumer Court, Court Marriage, Criminal, Cyber Crime, Divorce, Documentation, GST, Domestic Violence, Family, Labour & Service, Motor Accident

Get Advice
Advocate Prafulla Kumar Gautam

Advocate Prafulla Kumar Gautam

Bankruptcy & Insolvency, Breach of Contract, Child Custody, Civil, Court Marriage, Criminal, Divorce, GST, Domestic Violence, Family, High Court, Insurance, Labour & Service, Landlord & Tenant, Motor Accident, Muslim Law, Property, Succession Certificate, Supreme Court, Tax, Wills Trusts, Revenue, Anticipatory Bail

Get Advice
Advocate Jitendra Tripathi

Advocate Jitendra Tripathi

GST, Tax, High Court, Revenue, Banking & Finance

Get Advice
Advocate Shubhendra B Khuman

Advocate Shubhendra B Khuman

Civil, Criminal, Family, High Court, Revenue

Get Advice
Advocate Abhishek

Advocate Abhishek

Cyber Crime, Family, Court Marriage, Cheque Bounce, Domestic Violence

Get Advice

आपराधिक Related Questions

Discover clear and detailed answers to common questions about Breach of Contract. Learn about procedures and more in straightforward language.