Answer By law4u team
भारत में मुस्लिम परिवार के मामलों, जैसे कि विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता, विरासत और वक्फ से संबंधित मामलों पर विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) और वैधानिक कानूनों का एक विस्तृत ढांचा लागू होता है. इन मामलों को मुख्य रूप से शरियत (इस्लामी कानून) के सिद्धांतों और भारत के संसद द्वारा बनाए गए अधिनियमों के माध्यम से विनियमित किया जाता है. ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश काल में बनाए गए कुछ कानून और स्वतंत्रता के बाद के कानून आज भी भारतीय न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 भारत में मुसलमानों से संबंधित पारिवारिक मामलों का मूल आधार है. इस अधिनियम के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि उत्तराधिकार, विशेष संपत्ति, विवाह, तलाक, मेहर (दहेज जैसी राशि जो पत्नी को दी जाती है), भरण-पोषण, संरक्षकता, उपहार, ट्रस्ट और वक्फ से जुड़े मामलों में, जहां पार्टियां मुसलमान हैं, वहां निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार ही लिया जाएगा, न कि किसी अन्य प्रथागत या रूढ़िवादी कानून के तहत. विवाह और निकाह के मामले में भारत में कोई एक समेकित वैधानिक संहिता नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक इस्लामी न्यायशास्त्र (मुख्य रूप से हनफी मज़हब के सिद्धांतों) द्वारा शासित होता है. हालांकि, विवाह को एक नागरिक अनुबंध (सिविल कॉन्ट्रैक्ट) माना जाता है, जिसमें निकाहनामा (विवाह अनुबंध) महत्वपूर्ण होता है. विवाह की वैधता और अधिकारों को तय करने के लिए शरियत के नियमों का पालन किया जाता है. तलाक के मामलों के लिए मुसलमानों के पास अलग-अलग कानूनी रास्ते हैं. पुरुष के लिए पारंपरिक मौखिक या लिखित तलाक (जैसे तलाक-ए-बिद्दत या तीन तलाक) की प्रथा को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत अवैध और दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया है. इसके अलावा, न्यायिक तलाक के लिए Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 लागू होता है, जिसके तहत एक मुस्लिम पत्नी अदालत के माध्यम से विभिन्न आधारों पर तलाक की डिक्री प्राप्त कर सकती है, जैसे पति का पता न होना, क्रूरता, या भरण-पोषण न करना. भरण-पोषण यानी गुजारा भत्ता के मामले में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 विशेष रूप से लागू होता है. यह अधिनियम तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के इद्दत की अवधि के दौरान और उसके बाद के भरण-पोषण के अधिकारों को निर्धारित करता है. इसके अतिरिक्त, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की संबंधित धारा) के तहत भी पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का दावा किया जा सकता है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया गया है. विरासत और उत्तराधिकार के मामलों में कुरान के नियमों और हदीस के आधार पर संपत्ति का वितरण किया जाता है. सुन्नी और शिया संप्रदायों के लिए उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग होते हैं, जो शरियत के अंतर्गत आते हैं. उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act, 1925) के सामान्य प्रावधान मुसलमानों की कृषि भूमि और वसीयत के कुछ पहलुओं को छोड़कर अधिकांश संपत्ति के मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अधीन ही काम करते हैं. दान, वक्फ और उपहार (हिबा) के मामलों के लिए वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) एक प्रमुख वैधानिक कानून है जो धार्मिक और दान उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों के प्रबंधन को नियंत्रित करता है. इसके अलावा, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 (Transfer of Property Act, 1882) के कुछ नियम उपहार (हिबा) के मामलों पर लागू होते हैं, हालांकि मुख्य रूप से मुस्लिम विधि के प्रावधान ही प्राथमिकता पाते हैं. बच्चों की संरक्षकता और उनके पालन-पोषण (गार्जियनशिप) के लिए गार्ड्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 (Guardianship and Wards Act, 1890) लागू होता है, लेकिन इसमें भी बच्चों की कस्टडी और संरक्षण तय करते समय मुस्लिम पर्सनल लॉ के सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाता है, जहां माँ को कम उम्र के बच्चों (हदानत) की कस्टडी का प्राथमिकता वाला अधिकार मिलता है, बशर्ते वह बच्चे के कल्याण के हित में हो. इस प्रकार, भारत में मुस्लिम परिवार के मामलों का समाधान एक मिली-जुली कानूनी व्यवस्था के तहत होता है, जिसमें शरियत के धार्मिक सिद्धांतों के साथ-साथ भारतीय संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम और न्यायपालिका द्वारा दिए गए निर्णय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और हर मामला अपनी विशिष्ट परिस्थितियों और लागू होने वाले कानून के आधार पर तय किया जाता है.