Answer By law4u team
कानूनी भाषा में ओनरशिप यानी स्वामित्व और पज़ेशन यानी कब्ज़ा दो बहुत ही महत्वपूर्ण और अलग-अलग अवधारणाएं हैं। इन दोनों के बीच का अंतर समझना संपत्ति विवादों और संपत्ति से जुड़े अधिकारों को सुलझाने में बहुत काम आता है। संपत्ति कानून और सिविल लॉ के तहत इन दोनों शब्दों के अर्थ और कानूनी प्रभाव पूरी तरह से भिन्न होते हैं। ओनरशिप का मतलब किसी संपत्ति पर पूर्ण और अंतिम अधिकार होना है। जिस व्यक्ति के पास किसी संपत्ति की ओनरशिप होती है, वह उस संपत्ति का वास्तविक मालिक कहलाता है। ओनरशिप एक कानूनी अधिकार है जो किसी व्यक्ति को संपत्ति का उपयोग करने, उसका उपभोग करने, उसे बेचने, उपहार में देने, किराए पर देने या वसीयत के जरिए किसी अन्य को ट्रांसफर करने का पूर्ण अधिकार देता है। ओनरशिप आमतौर पर किसी वैध सेल डीड, गिफ्ट डीड, विल या उत्तराधिकार के माध्यम से स्थापित होती है। जब तक कोई मालिक अपनी इच्छा से कानूनी दस्तावेजों के जरिए अपनी ओनरशिप किसी दूसरे को ट्रांसफर नहीं करता, तब तक वह संपत्ति का मालिक बना रहता है। यहाँ तक कि अगर मालिक उस संपत्ति पर खुद शारीरिक रूप से मौजूद नहीं है, तब भी उसकी ओनरशिप पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ओनरशिप के साथ उस संपत्ति से जुड़े सभी कानूनी लाभ और वित्तीय दायित्व जैसे टैक्स चुकाने की जिम्मेदारी भी मालिक की ही होती है। दूसरी ओर, पज़ेशन का मतलब किसी संपत्ति पर भौतिक नियंत्रण या कब्जा होना है। पज़ेशन का सीधा सा अर्थ है कि संपत्ति इस समय किसके शारीरिक अधिकार या इस्तेमाल में है। पज़ेशन रखने वाला व्यक्ति यह जरूरी नहीं कि उस संपत्ति का मालिक भी हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई मकान मालिक अपनी संपत्ति किसी किराएदार को किराए पर देता है, तो मकान मालिक उस संपत्ति का ओनर रहता है, लेकिन उस संपत्ति का पज़ेशन किराएदार के पास चला जाता है। इसी तरह, कोई चोर किसी घर में जबरन घुस जाए, तो उसके पास उस घर का अवैध पज़ेशन तो हो सकता है, लेकिन ओनरशिप कभी नहीं आ सकती। भारतीय कानून में पज़ेशन को भी एक मजबूत कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) की धारा 6 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी संपत्ति का वैध या शांतिपूर्ण कब्जा है, तो मालिक भी उसे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना जबरदस्ती बाहर नहीं निकाल सकता। यदि कोई मालिक ऐसा करता है, तो पज़ेशन खोने वाला व्यक्ति अदालत के माध्यम से अपने पज़ेशन की बहाली की मांग कर सकता है, भले ही वह उस संपत्ति का मालिक न हो। कानून यह मानता है कि कब्ज़ा अपने आप में नौ बिंदुओं का अधिकार है, जिसका मतलब है कि बिना कानूनी प्रक्रिया के पज़ेशन से बेदखल करना गैरकानूनी है। इन दोनों के बीच के प्रमुख अंतरों को विस्तार से समझा जा सकता है। सबसे पहला अंतर अधिकार के स्तर का है। ओनरशिप एक स्थायी और व्यापक अधिकार है जिसमें संपत्ति को नष्ट करने या बेचने की शक्ति भी शामिल होती है, जबकि पज़ेशन केवल उस समय संपत्ति के नियंत्रण और उपयोग तक सीमित होता है। दूसरा अंतर यह है कि ओनरशिप हमेशा एक ही व्यक्ति या कुछ चुनिंदा सह-स्वामियों के पास होती है, लेकिन पज़ेशन एक समय में एक से अधिक रूपों में हो सकता है, जैसे कि मालिक ने किसी को पट्टा दे रखा है या कोई लाइसेंसधारी वहां रह रहा है। तीसरा अंतर यह है कि ओनरशिप को साबित करने के लिए मालिकाना हक के दस्तावेज जैसे रजिस्ट्री, सेल डीड या म्यूटेशन रिकॉर्ड दिखाने पड़ते हैं, जबकि पज़ेशन को साबित करने के लिए बिजली का बिल, पानी का बिल, आधार कार्ड पर पता या उस संपत्ति पर शारीरिक मौजूदगी जैसे सबूत काम आते हैं। संपत्ति कानून के संदर्भ में यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी अधिनियम, 1882 (Transfer of Property Act, 1882) के तहत संपत्ति का वैध हस्तांतरण मुख्य रूप से ओनरशिप के ट्रांसफर से जुड़ा होता है। जब तक ओनरशिप ट्रांसफर करने के लिए उचित कानूनी दस्तावेज और रजिस्ट्रेशन नहीं होता, तब तक केवल पज़ेशन देने से खरीदार कानूनी रूप से संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। हालांकि, अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी संपत्ति पर लगातार, खुले तौर पर और मालिक के विरोध के बिना शांतिपूर्ण पज़ेशन रखता है, तो भारतीय सीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) के प्रावधानों के तहत प्रतिकूल कब्जे यानी एडवर्स पज़ेशन के सिद्धांत के आधार पर वह पज़ेशन ओनरशिप में भी बदल सकता है, बशर्ते अदालत में इसके सभी कानूनी मानक साबित किए जाएं। इसलिए ओनरशिप और पज़ेशन दोनों अलग कानूनी स्थितियां हैं, जो कई बार एक ही व्यक्ति के पास हो सकती हैं और कई बार अलग-अलग व्यक्तियों के पास भी हो सकती हैं।