Answer By law4u team
इस्लामी कानून और भारतीय कानून के तहत एक सही और वैध निकाह (विवाह) के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें और स्तंभ होते हैं जिनका पूरा होना कानूनी और धार्मिक दोनों दृष्टियों से बेहद जरूरी है। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत भारत में मुसलमानों के विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में शरीयत के प्रावधान लागू होते हैं। एक वैध निकाह के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि दोनों पक्ष यानी वर और वधु मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए और बालिग होने चाहिए। बालिग होने की कानूनी उम्र भारत में लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है, हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यौवन की अवस्था यानी प्यूबर्टी को भी बालिग होने का मानक माना जाता है, लेकिन बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रावधानों का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि निकाह में दोनों पक्षों की स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति (इजाजत) होनी चाहिए। किसी भी दवाब, जबरदस्ती, धोखाधड़ी या डर के साये में किया गया निकाह अमान्य या शून्य माना जाता है। विशेष रूप से दुल्हन की रजामंदी निकाह के समय ली जानी अनिवार्य है, और यदि दुल्हन बालिग है तो उसकी सहमति के बिना निकाह पूरा नहीं हो सकता। इसके अलावा वर और वधु के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए जो शरीयत के अनुसार रक्त संबंध, दूध पिलाने के संबंध या विवाह के कारण हमेशा के लिए वर्जित (हराम) हो, जैसे कि माता, बहन, बेटी या अन्य नजदीकी रिश्तेदार जिनके साथ निकाह करना प्रतिबंधित है। तीसरी प्रमुख शर्त निकाह के गवाहों से जुड़ी है। एक वैध निकाह के आयोजन के दौरान गवाहों का होना अनिवार्य है। सुन्नी कानून के तहत निकाह के समय कम से कम दो साक्ष यानी दो समझदार और बालिग मुस्लिम पुरुष गवाह, या एक पुरुष और दो महिलाएं गवाह के रूप में मौजूद होनी चाहिए जो पूरी प्रक्रिया को सुनें और समझें। शिया कानून के अनुसार निकाह के समय गवाहों का होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन विवाह की घोषणा और सार्वजनिक रूप से इसका प्रसार करना आवश्यक माना जाता है ताकि समाज में किसी प्रकार का संशय न रहे। चौथी मुख्य शर्त मेहर (डौरी) का निर्धारण है। मेहर वह धन या संपत्ति है जो वर पक्ष द्वारा वधु को निकाह के समय या उसके बाद देना अनिवार्य होता है। यह पत्नी का कानूनी और धार्मिक अधिकार है। निकाह के दौरान या निकाह से पहले मेहर की राशि या वस्तु का स्पष्ट रूप से तय किया जाना जरूरी है। यदि निकाह के समय मेहर तय नहीं भी किया गया है, तब भी पत्नी उचित मेहर (मेहर-ए-मिस्ल) की हकदार होती है और पति को उसका भुगतान करना पड़ता है। मेहर के बिना भी निकाह तकनीक रूप से हो सकता है, लेकिन मेहर तय करना और देना पति का कानूनी दायित्व है। पांचवीं और अंतिम शर्त निकाह का प्रस्ताव और उसकी स्वीकृति (ईजाब और कुबूल) है। निकाह की मजलिस या बैठक में वर पक्ष या उसके वकील की तरफ से प्रस्ताव रखा जाता है जिसे इज़ाब कहते हैं, और वधु पक्ष द्वारा या उसके वकील (वकील या वली) की उपस्थिति में उसे स्वीकार किया जाता है जिसे कुबूल कहते हैं। यह पूरी प्रक्रिया गवाहों के सामने एक ही बैठक में होनी चाहिए। यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती है, तो निकाह बातिल (अवैध और शून्य) या फिर फासिद (दोषपूर्ण) घोषित किया जा सकता है, जिससे उत्तराधिकार और वैवाहिक अधिकारों पर गंभीर कानूनी असर पड़ सकता है।