Answer By law4u team
मुस्लिम कानून के अंतर्गत निकाह को एक अत्यंत पवित्र, महत्वपूर्ण और वैध अनुबंध माना जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में वैवाहिक जीवन की स्थापना करना, संतान की उत्पत्ति करना और नैतिक पवित्रता को बनाए रखना है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रसिद्ध न्यायविद् अब्दुल रहीम के अनुसार निकाह एक ऐसा अनुबंध है जिसका उद्देश्य बच्चों की उत्पत्ति और उनके पालन-पोषण को वैध बनाना है। यह किसी भी प्रकार का कोई धार्मिक संस्कार या पूजा-पाठ नहीं है बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक सिविल अनुबंध (Civil Contract) है, जिसमें दोनों पक्षों की आपसी सहमति सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। मुस्लिम कानून में निकाह के वैध होने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें और स्तंभ तय किए गए हैं जिन्हें पूरा करना कानूनन आवश्यक है। सबसे पहली शर्त यह है कि विवाह करने वाले दोनों पक्ष, यानी वर और वधू, सक्षम होने चाहिए। इसका अर्थ यह है कि वे बालिग (Puberty प्राप्त) और मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए। यदि कोई व्यक्ति नाबालिग है या मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो उसका निकाह सीधे तौर पर वैध नहीं माना जाता है, हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में उसके अभिभावक द्वारा इसमें सहमति दी जा सकती है, लेकिन सामान्य नियम स्वतंत्र और वयस्क सहमति का ही है। निकाह के लिए दूसरी और सबसे अहम शर्त दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति (Free Consent) है। मुस्लिम विधि के सुन्नी संप्रदाय में यह आवश्यक है कि विवाह के प्रस्ताव (इजाब) और उसकी स्वीकृति (कबूल) को एक ही मजलिस यानी एक ही बैठक में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति पर बल प्रयोग करके, धोखाधड़ी से या दबाव डालकर निकाह के लिए राजी किया गया है, तो ऐसा निकाह शून्य (Void) या अमान्य माना जाता है। शिया कानून और सुन्नी कानून दोनों में ही पुरुष और महिला की स्पष्ट और स्वतंत्र रजामंदी को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। तीसरी महत्वपूर्ण शर्त गवाहों की उपस्थिति है। सुन्नी कानून के तहत यह अनिवार्य है कि निकाह के प्रस्ताव और उसकी स्वीकृति के समय कम से कम दो वयस्क और समझदार मुस्लिम पुरुष गवाह, या फिर एक पुरुष और दो महिला गवाह अवश्य उपस्थित होने चाहिए जो दोनों पक्षों की बात को स्पष्ट रूप से सुन सकें। गवाहों का होना इस बात की कानूनी पुष्टि करता है कि विवाह गुप्त नहीं है बल्कि समाज के सामने एक वैध अनुबंध के रूप में संपन्न हुआ है। शिया कानून में निकाह के समय गवाहों का होना अनिवार्य नहीं माना जाता है, लेकिन विवाह की सार्वजनिक घोषणा (Publicity) को वहां भी बहुत महत्व दिया जाता है ताकि समाज में किसी प्रकार का संदेह न रहे। चौथी मुख्य शर्त मेहर (Mahr) का प्रावधान है। मेहर वह धन या संपत्ति है जिसे पाने का कानूनी अधिकार मुस्लिम पत्नी को निकाह के अनुबंध के परिणामस्वरूप उसके पति से प्राप्त होता है। यह इस्लाम में पत्नी के प्रति पति के सम्मान और उसकी आर्थिक सुरक्षा का एक अनिवार्य प्रतीक है। मेहर की राशि या वस्तु का निर्धारण निकाह के समय ही आपसी सहमति से तय कर दिया जाता है। यदि निकाह के वक्त मेहर तय नहीं भी किया गया है, तब भी कानून पत्नी को उचित मेहर (Mahr-e-Misl) पाने का हकदार बनाता है। मेहर के बिना भी कुछ मामलों में निकाह हो सकता है, लेकिन पत्नी को मेहर पाने का कानूनी अधिकार हमेशा सुरक्षित रहता है। पांचवीं बात यह है कि निकाह के संबंध में कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं जिनमें विवाह करना सर्वथा वर्जित होता है, जिन्हें मुस्लिम कानून में हुरमत (Prohibited Degrees) कहा जाता है। ये प्रतिबंध रक्त संबंध (Consanguinity), विवाह संबंध (Affinity), और दूध पिलाने के संबंध (Fosterage) पर आधारित होते हैं। उदाहरण के लिए, माता, बहन, बेटी, मौसी, बुआ आदि के साथ निकाह करना कानूनन पूरी तरह से प्रतिबंधित और अवैध है। यदि इन वर्जित रिश्तों के बीच कोई निकाह किया जाता है, तो वह कानून की नजरों में अमान्य होता है। इस प्रकार मुस्लिम कानून में निकाह केवल स्त्री और पुरुष का शारीरिक संबंध नहीं है, बल्कि यह अधिकारों और कर्तव्यों का एक ऐसा कानूनी ढांचा है जो परिवार नामक संस्था की नींव रखता है। इस अनुबंध के माध्यम से पति और पत्नी एक-दूसरे के प्रति वैवाहिक कर्तव्यों से बंध जाते हैं, और बच्चों की वैधता, उत्तराधिकार के अधिकार तथा आपसी भरण-पोषण (Maintenance) के कानूनी प्रावधान स्वतः ही लागू हो जाते हैं।