Answer By law4u team
हाँ, बिल्कुल। भारत में यदि कोई पैदल यात्री सड़क पर चलते समय किसी गाड़ी या मोटर वाहन की चपेट में आ जाता है और उसे चोट लगती है, तो वह निश्चित रूप से मुआवज़े का दावा कर सकता है। मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 (MV Act) के तहत ऐसे मामलों में मुआवज़ा पाने का स्पष्ट कानूनी प्रावधान है। गाड़ी से टक्कर होने पर पैदल यात्री को सड़क दुर्घटना का पीड़ित माना जाता है और कानून के अनुसार उसे वित्तीय सहायता या मुआवज़े का अधिकार प्राप्त है। मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 (MV Act) की धारा 166 के अंतर्गत पीड़ित व्यक्ति या उसके कानूनी उत्तराधिकारी सीधे मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में मुआवज़े के लिए दावा याचिका दायर कर सकते हैं। इसके अलावा, इसी कानून की धारा 164 के तहत 'नो फॉल्ट लायबिलिटी' का भी प्रावधान है, जिसका मतलब यह है कि यदि दुर्घटना में पैदल यात्री की गंभीर चोट या मृत्यु हो जाती है, तो वाहन चालक या बीमा कंपनी को बिना यह साबित किए भी मुआवजा देना पड़ सकता है कि गलती किसकी थी। पैदल यात्री द्वारा मुआवज़े की मांग करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कानूनी चरण और प्रक्रियाएं होती हैं जिनका पालन करना आवश्यक है। सबसे पहले दुर्घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई जानी चाहिए। पुलिस रिपोर्ट, जिसे आमतौर पर चार्जशीट या दुर्घटना सूचना रिपोर्ट कहा जाता है, एमएसीटी के समक्ष दावे की कार्यवाही का एक बहुत ही महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। दुर्घटना के तुरंत बाद पैदल यात्री को किसी नज़दीकी अस्पताल में अपना मेडिकल इलाज कराना चाहिए और सभी मेडिकल बिल, डॉक्टर की पर्चियाँ, एक्स-रे रिपोर्ट, और डिस्चार्ज समरी को सुरक्षित रखना चाहिए। ये सभी कागजात अदालत में यह साबित करने के लिए आवश्यक होते हैं कि चोट कितनी गंभीर थी और इलाज में कितना खर्च आया। मुआवज़े की राशि तय करते समय एमएसीटी कई बातों पर विचार करता है। इनमें चिकित्सा पर हुआ खर्च, भविष्य के इलाज का खर्च, अस्पताल में रहने के दौरान हुआ नुकसान, शारीरिक अक्षमता के कारण भविष्य में कमाने की क्षमता का नुकसान, और दर्द व पीड़ा के लिए मुआवजा शामिल होता है। यदि दुर्घटना के कारण पैदल यात्री की मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रित परिवार के सदस्य जैसे पति या पत्नी, बच्चे और माता-पिता मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 (MV Act) के तहत मुआवज़े का दावा कर सकते हैं। ऐसे मामलों में आश्रितों की आय, मृतक की उम्र और परिवार पर उसकी निर्भरता को ध्यान में रखकर राशि तय की जाती है। भारत में हर सार्वजनिक सड़क पर चलने वाले मोटर वाहन के लिए थर्ड पार्टी मोटर बीमा होना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसलिए, जब कोई पैदल यात्री किसी गाड़ी से टकराता है, तो मुआवज़े का भुगतान अंततः उस वाहन की बीमा कंपनी द्वारा ही किया जाता है, बशर्ते वाहन के पास वैध बीमा और दस्तावेज हों। यदि वाहन का बीमा नहीं है या वाहन अज्ञात है और चालक मौके से फरार हो जाता है, जिसे हिट एंड रन मामला कहा जाता है, तब भी सरकार की एक विशेष योजना के तहत पीड़ित को मुआवजा मिल सकता है, जिसके लिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के तहत आवेदन किया जाता है। दावा दायर करने के लिए एक निश्चित समय सीमा भी होती है। मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 (MV Act) के संशोधनों के अनुसार, दुर्घटना की तिथि से आमतौर पर छह महीने के भीतर एमएसीटी में दावा याचिका दायर कर देनी चाहिए ताकि मामले की सुनवाई समय पर शुरू हो सके। देरी होने पर कोर्ट को संतोषजनक कारण बताना पड़ सकता है। यदि वाहन चालक लापरवाही से गाड़ी चला रहा था, ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं कर रहा था, या नशे की हालत में था, तो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत चालक के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है। आपराधिक मामला चलने से पुलिस जांच पुख्ता होती है, जिससे एमएसीटी में मुआवज़े का दावा जीतने में आसानी होती है। संक्षेप में, यदि कोई पैदल यात्री गाड़ी की टक्कर से घायल होता है, तो उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भारतीय कानून उसे वाहन चालक और बीमा कंपनी से मुआवज़ा प्राप्त करने का पूरा अधिकार देता है। इसके लिए उसे सभी मेडिकल दस्तावेज, पुलिस एफआईआर और गवाहों के साथ मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल में विधिवत कानूनी प्रक्रिया के तहत आवेदन करना चाहिए।