Answer By law4u team
हाँ, यदि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रित परिवार के सदस्य कानूनी रूप से मुआवजे का दावा करने के पूरे हकदार हैं। भारतीय कानून के तहत इस तरह के मामलों में न्याय सुनिश्चित करने के लिए मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988) के प्रावधानों के तहत मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण यानी मोटर एक्सीडेंट्स क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में दावा याचिका दायर की जाती है। यह मुआवजा पीड़ित परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से दिया जाता है ताकि मुख्य कमाने वाले की अचानक मृत्यु से जो वित्तीय संकट पैदा हुआ है, उसकी भरपाई की जा सके। मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 की धारा 166 के तहत पीड़ित परिवार या आश्रित मुआवजे के लिए सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इस धारा के अंतर्गत दावा करने के लिए यह साबित करना होता है कि दुर्घटना वाहन चालक की लापरवाही या तेजी से गाड़ी चलाने के कारण हुई थी। इसके अलावा, इसी कानून की धारा 163A (या संशोधित प्रावधानों के तहत धारा 165 और संबंधित खंड) के तहत 'नो फॉल्ट लायबिलिटी' का सिद्धांत भी लागू होता है, जिसका मतलब है कि यदि लापरवाही साबित करना मुश्किल भी हो, तब भी एक निश्चित और तयशुदा मुआवजा परिवार को मिल सकता है। मुआवजे की गणना करते समय अदालत कई महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखती है। सबसे पहले मृतक की आय (Income) को देखा जाता है, जिसमें उसकी नौकरी या व्यवसाय से होने वाली नियमित कमाई शामिल होती है। यदि मृतक की उम्र कम थी और वह भविष्य में तरक्की करने वाला था, तो भविष्य की संभावनाओं यानी फ्यूचर प्रोस्पेक्ट्स को भी जोड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, यदि मृतक की उम्र 40 वर्ष से कम है और वह वेतनभोगी था, तो उसकी आय में भविष्य की संभावनाओं के लिए 50 प्रतिशत तक की वृद्धि जोड़ी जा सकती है। इसके बाद मृतक के व्यक्तिगत खर्चे को उसकी आय से घटाया जाता है, क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो अपने ऊपर भी कुछ खर्च करता। आश्रितों की संख्या के आधार पर एक तिहाई से लेकर आधे तक की राशि व्यक्तिगत खर्च के रूप में काटी जाती है। पारिवारिक आश्रितों की श्रेणी में मृतक की पत्नी, उसके बच्चे और उसके माता-पिता आते हैं। इन सभी को कानूनी रूप से आश्रित माना गया है और वे मुआवजे के हकदार हैं। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रanay सेठी (Pranay Sethi) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, गैर-आर्थिक नुकसान के लिए भी मुआवजा दिया जाता है जैसे कि पति या पत्नी के लिए कंसोर्टियम (Spousal Consortium), बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार और मार्गदर्शन (Parental Consortium), और अंतिम संस्कार का खर्च तथा संपत्ति के नुकसान के लिए एक निश्चित राशि दी जाती है। इन पारंपरिक मदों में हर तीन साल में एक निश्चित प्रतिशत की वृद्धि का भी प्रावधान है। दावा दायर करने की प्रक्रिया में पुलिस एफआईआर (FIR), पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Postmortem Report), मृतक का मृत्यु प्रमाण पत्र, आय का प्रमाण जैसे सैलरी स्लिप या इनकम टैक्स रिटर्न, और आश्रितों के पहचान पत्र जैसे दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। पहले मोटर व्हीकल्स एक्ट में दावा याचिका दायर करने की कोई समय सीमा नहीं थी, लेकिन संशोधनों के बाद अब सामान्यतः छह महीने के भीतर एमएसीटी (MACT) में याचिका दायर करना बेहतर माना जाता है ताकि सबूत सुरक्षित रहें। यदि वाहन का बीमा (Third Party Insurance) है, तो बीमा कंपनी मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होती है। यदि वाहन का बीमा नहीं था, तो वाहन के मालिक और चालक को व्यक्तिगत रूप से मुआवजे की राशि चुकानी होगी। परिवार चाहे तो आपराधिक मामलों के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 के तहत लापरवाही से मौत के मामले में पुलिस में एफआईआर दर्ज करा सकता है, जो कि सजा से संबंधित है, जबकि मुआवजे के लिए सिविल प्रक्रिया के तहत एमएसीटी में अलग से केस चलाना होता है। इस प्रकार सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को कानून के माध्यम से पूरा वित्तीय मुआवजा पाने का अधिकार प्राप्त है।