Answer By law4u team
भारत में किसी भी प्रॉपर्टी को खरीदने से पहले उसका लीगल टाइटल वेरिफ़ाई करना बेहद ज़रूरी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रॉपर्टी पूरी तरह से साफ-सुथरी है और उस पर किसी प्रकार का कोई कानूनी विवाद, बैंक लोन या अन्य कोई भार (encumbrance) नहीं है। टाइटल वेरिफ़ाई करने की प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं और खरीदार को दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक जांच करनी होती है। सबसे पहले खरीदार को प्रॉपर्टी के पिछले कम से कम 30 वर्षों के टाइटल डीड यानी मालिकाना हक के दस्तावेज देखने चाहिए। इन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि समय-समय पर प्रॉपर्टी किसके नाम पर ट्रांसफर हुई है और वर्तमान विक्रेता के पास यह प्रॉपर्टी कहां से और कैसे आई। यदि प्रॉपर्टी पैतृक यानी एंसेस्ट्रल है, तो यह देखना आवश्यक है कि परिवार के सभी कानूनी वारिसों का इस पर सहमति पत्र या हक त्याग पत्र (relinquishment deed) है या नहीं, ताकि भविष्य में परिवार का कोई अन्य सदस्य इस पर अपना दावा न ठोक सके। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम सब-रजिस्टार कार्यालय से प्रॉपर्टी का एनकम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट (EC) निकलवाना होता है। यह सर्टिफिकेट कम से कम 15 से 30 साल का होना चाहिए। ईसी इस बात का प्रमाण होता है कि प्रॉपर्टी पर इस अवधि के दौरान कोई बैंक लोन, मॉर्गेज, कोर्ट अटैचमेंट या अन्य कोई देनदारी दर्ज है या नहीं। यदि प्रॉपर्टी पर कोई लोन चल रहा है, तो जब तक वह लोन पूरी तरह से चुकता नहीं हो जाता और बैंक से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक प्रॉपर्टी का सौदा करना जोखिम भरा हो सकता है। इसके अलावा, यदि प्रॉपर्टी किसी हाउसिंग सोसाइटी या डेवलपमेंट अथॉरिटी जैसे कि डीडीए या म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के तहत आती है, तो खरीदार को संबंधित प्राधिकरण से नो ड्यूज सर्टिफिकेट और अलॉटमेंट लेटर की जांच करनी चाहिए। प्रॉपर्टी के भौतिक और कानूनी अस्तित्व की पुष्टि के लिए म्युनिसिपल रिकॉर्ड्स की भी जांच करनी चाहिए। खरीदार को यह देखना चाहिए कि प्रॉपर्टी का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) वर्तमान विक्रेता के नाम पर हुआ है या नहीं। म्यूटेशन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी रिकॉर्ड में उस जमीन या मकान का मालिक कौन दर्ज है। इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों के प्रॉपर्टी टैक्स की रसीदों की जांच करना भी जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि कोई टैक्स बकाया तो नहीं है। यदि प्रॉपर्टी कृषि भूमि है, तो उसे गैर-कृषि यानी एनए (NA) भूमि में परिवर्तित किया गया है या नहीं, इसकी जांच राज्य के राजस्व विभाग के भूमि अभिलेखों से करनी चाहिए। इस संबंध में प्रासंगिक कानून जैसे ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 (Transfer of Property Act, 1882) के प्रावधानों के तहत यह अनिवार्य है कि खरीदार उचित सावधानी (due diligence) बरते। किसी भी संभावित धोखाधड़ी से बचने के लिए यह भी सलाह दी जाती है कि खरीदार स्थानीय अखबारों में एक पब्लिक नोटिस (Public Notice) छपवाएं और आपत्तियां आमंत्रित करें। इस नोटिस में विक्रेता और प्रॉपर्टी का विवरण देकर यह पूछा जाता है कि क्या किसी अन्य व्यक्ति का इस संपत्ति पर कोई लीगल हक, शेयर, लीज या मॉर्गेज है। यदि तय समय सीमा के भीतर कोई दावा नहीं आता है, तो इसे खरीदार के पक्ष में एक सुरक्षा कवच माना जाता है। यदि प्रॉपर्टी का मूल्य अधिक है या दस्तावेजों की भाषा जटिल है, तो किसी अनुभवी प्रॉपर्टी वकील (Advocate) की सेवाएं ली जानी चाहिए, जो टाइटल ओपिनियन (Title Opinion) दे सके। वकील सभी दस्तावेजों की गहन जांच करके यह प्रमाणित करता है कि प्रॉपर्टी का टाइटल स्पष्ट और विपणन योग्य (marketable) है या नहीं। इन सभी प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि भविष्य में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) या भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) के तहत किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या मुकदमेबाजी का सामना न करना पड़े और खरीदार का निवेश सुरक्षित रहे।