Answer By law4u team
भारतीय कानून के अंतर्गत नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होना एक आपराधिक अपराध माना जाता है। जब किसी व्यक्ति द्वारा दिया गया चेक बैंक से पर्याप्त राशि न होने के कारण या खाते में पैसे न होने के कारण बाउंस हो जाता है, तब इस कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत होती है। इस अपराध के लिए कानून में कड़े प्रावधान किए गए हैं ताकि वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता और विश्वास बना रहे। सेक्शन 138 के तहत दोषी पाए जाने पर न्यायालय द्वारा विभिन्न प्रकार के दंड दिए जा सकते हैं, जिनकी विस्तृत जानकारी निम्नलिखित है। 1. कारावास यानी जेल की सजा: इस धारा के तहत दोषी व्यक्ति को दो साल तक की अवधि के लिए सादा या कठोर कारावास की सजा सुनाई जा सकती है। यह सजा अदालत के विवेक पर निर्भर करती है कि अपराध की गंभीरता और राशि का आकार कितना बड़ा है। न्यायालय आमतौर पर उन मामलों में अधिक कठोर रुख अपनाता है जहां धोखाधड़ी का स्पष्ट उद्देश्य दिखाई देता है। 2. आर्थिक जुर्माना: चेक बाउंस होने के मामले में अदालत दोषी व्यक्ति पर चेक की मूल राशि का दोगुना तक का जुर्माना लगा सकती है। यह जुर्माना राशि शिकायतकर्ता को मुआवजा देने के उद्देश्य से तय की जाती है ताकि उसे हुई वित्तीय हानि और मानसिक परेशानी की भरपाई की जा सके। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कारावास और जुर्माना दोनों एक साथ भी दिए जा सकते हैं। 3. अंतरिम मुआवजा देने का आदेश: नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट में संशोधन के बाद अदालत को यह शक्ति मिल गई है कि वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही शिकायतकर्ता को चेक की राशि का बीस प्रतिशत तक अंतरिम मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकती है। यह राशि मुकदमे का फैसला आने से पहले चुकानी होती है, और यदि आरोपी ऐसा करने में विफल रहता है तो उस पर आगे की कानूनी कार्रवाई हो सकती है। 4. डिफ़ॉल्ट सजा: यदि न्यायालय द्वारा लगाए गए जुर्माने का भुगतान दोषी व्यक्ति द्वारा समय पर नहीं किया जाता है, तो अदालत जुर्माने की राशि की वसूली न होने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास की सजा भी सुना सकती है। यह अतिरिक्त सजा मूल कारावास के अलावा होती है और इसका उद्देश्य न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित करना है। 5. कानूनी प्रक्रिया और समय-सीमा: इस धारा के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए कुछ अनिवार्य कानूनी चरणों का पालन करना होता है। चेक बाउंस होने के बैंक से मेमो मिलने के तीस दिनों के भीतर चेक जारी करने वाले व्यक्ति को एक कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य होता है। इस नोटिस में पंद्रह दिनों का समय दिया जाता है जिसके भीतर भुगतान करना होता है। यदि उस पंद्रह दिन की अवधि के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो अगले तीस दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में लिखित शिकायत दर्ज करानी होती है। 6. समझौता और समन्यय: NI Act की धारा 138 के तहत आने वाले अपराध समन्ययी यानी कंपाउंडेबल होते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि दोनों पक्ष यानी शिकायतकर्ता और आरोपी आपसी सहमति से मामले को सुलझाना चाहें, तो वे अदालत की अनुमति से मामला वापस ले सकते हैं। यदि आरोपी बकाया राशि और अदालत द्वारा तय की गई अतिरिक्त लागत का भुगतान कर देता है, तो कई मामलों में अदालत कार्यवाही समाप्त कर देती है। 7. अपील करने का अधिकार: यदि किसी व्यक्ति को लोअर कोर्ट या मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा सेक्शन 138 के तहत दोषी ठहराया जाता है, तो उसके पास उच्च न्यायालय यानी सेशन कोर्ट में अपील करने का कानूनी अधिकार होता है। आरोपी इस फैसले के खिलाफ सत्र न्यायालय में चुनौती दे सकता है और सजा पर रोक लगाने के लिए आवेदन भी कर सकता है बशर्ते वह अदालत द्वारा तय की गई कुछ शर्तें पूरी करे। इस प्रकार, चेक बाउंस होना केवल एक दीवानी मामला नहीं बल्कि एक गंभीर फौजदारी अपराध है जिसके परिणाम स्वरूप गंभीर कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। वित्तीय लेन-देन करते समय हमेशा पर्याप्त सावधानी बरतनी चाहिए ताकि ऐसी किसी भी अप्रिय कानूनी स्थिति से बचा जा सके।