Answer By law4u team
हाँ, महर कानूनी तौर पर पूरी तरह से लागू है और यह मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के साथ-साथ भारतीय कानूनी प्रणाली के तहत भी एक वैध और अनिवार्य दायित्व है। मुस्लिम विवाह (जिसे निकाह कहा जाता है) में महर वह धन या संपत्ति है जो पति द्वारा पत्नी को विवाह के प्रति सम्मान और उसके वित्तीय अधिकार के रूप में देना कानूनी और धार्मिक रूप से अनिवार्य होता है। महर के संबंध में कानूनी स्थिति को पूरी तरह से समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं को विस्तार से जानना आवश्यक है। 1. विवाह का अनिवार्य हिस्सा मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, महर निकाह की एक आवश्यक शर्त है। इसके बिना निकाह अधूरा माना जाता है, भले ही विवाह के समय महर की राशि या वस्तु स्पष्ट रूप से तय न की गई हो, तब भी पत्नी कानूनन उचित मह पाने की हकदार होती है। 2. मुस्लिम महिला (विवाह विघटन के अधिकार) अधिनियम, 1985 इस कानून के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि तलाक के समय या उसके बाद भी पति का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह पत्नी को उसका देय महर अदा करे। यदि पति महर देने से इनकार करता है, तो पत्नी अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत वसूली के लिए मुकदमा दायर कर सकती है। 3. दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) अदालत के कई फैसलों के अनुसार, महर की राशि का भुगतान केवल इसलिए माफ नहीं किया जा सकता कि पति ने पत्नी को तलाक दे दिया है। धारा 125 के तहत भरण-पोषण के दावों से अलग महर का दावा एक स्वतंत्र अधिकार है। पत्नी भरण-पोषण के साथ-साथ अपने बकाया महर की भी मांग कानूनी रूप से कर सकती है। 4. महर के प्रकार और उनकी वसूली महर मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है - तुरंत देय महर (महर-ए-मुअज्जल्) और विलंबित महर (महर-ए-मुवज्जल्)। तुरंत देय महर मांग करते ही या निकाह के तुरंत बाद देना होता है, जबकि विलंबित महर का भुगतान तलाक या पति की मृत्यु जैसी किसी निश्चित घटना के समय किया जाता है। यदि पति इसका भुगतान नहीं करता है, तो पत्नी दीवानी अदालत में धन की वसूली के लिए वाद दायर कर सकती है। इस मुकदमे की परिसीमा अवधि (Limitation Period) उस तारीख से तीन वर्ष होती है जिस तारीख को महर की मांग की गई और पति ने देने से इनकार कर दिया। 5. संपत्ति पर अधिकार और प्रतिधारण का अधिकार (Right of Retention) यदि पति की मृत्यु हो जाती है या वह तलाक के बाद महर का भुगतान नहीं करता है, और पत्नी के कब्जे में पति की कोई संपत्ति है, तो मुस्लिम कानून के तहत पत्नी को यह अधिकार मिलता है कि वह तब तक उस संपत्ति को अपने कब्जे में रख सकती है जब तक कि उसे उसका पूरा महर नहीं मिल जाता। हालांकि, यह अधिकार संपत्ति का स्वामित्व नहीं देता है, बल्कि केवल बकाया महर मिलने तक उसे रोकने का कानूनी हक देता है। 6. अनुबंध और संवैधानिक मान्यता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार शामिल है। महर महिलाओं को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है ताकि वे विवाह के टूटने या पति की मृत्यु के बाद आर्थिक रूप से असहाय न हों। भारतीय अदालतें मुस्लिम विवाह अनुबंध के इस महत्वपूर्ण हिस्से को पूरी तरह से मानती हैं और पतियों को महर चुकाने के लिए बाध्य करती हैं। संक्षेप में, महर केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि एक मजबूत कानूनी अधिकार है जिसे भारत की दीवानी अदालतों में मुकदمه के जरिए पूरी तरह से लागू कराया जा सकता है। पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता और यदि वह भुगतान नहीं करता है, तो पत्नी अदालत के माध्यम से अपनी बकाया राशि की वसूली करवा सकती है।