Answer By law4u team
इस्लामिक पारिवारिक कानून और भारतीय न्याय प्रणाली के तहत महर पाने का अधिकार विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं को प्राप्त होता है। निकाह यानी विवाह के अनुबंध के समय पति द्वारा पत्नी को दी जाने वाली संपत्ति, धन या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु को महर कहा जाता है। यह मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत पत्नी का एक कानूनी और धार्मिक अधिकार है, जिसे शादी के समय तय किया जाता है या बाद में भी निर्धारित किया जा सकता है। मुस्लिम महिला अधिनियम और संबंधित कानूनों के तहत महर की राशि पर पूरी तरह से पत्नी का अधिकार होता है और इस पर पति या उसके परिवार का कोई कानूनी हक नहीं होता है। महर पाने की हकदार केवल वह मुस्लिम महिला होती है जिसके साथ वैध तरीके से निकाह संपन्न हुआ हो। महर दो प्रकार का होता है, एक वह जो तुरंत निकाह के समय या उसके तुरंत बाद दे दिया जाता है जिसे महर-ए-मुअज्जल् कहा जाता है, और दूसरा वह जो भविष्य के लिए या तलाक या पति की मृत्यु के समय के लिए स्थगित रखा जाता है जिसे महर-ए-मुअज्जल् कहा जाता है। यदि निकाह के समय महर की कोई राशि तय नहीं की गई थी, तब भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार महिला उचित महर पाने की हकदार होती है, जिसे महर-ए-मिस्ल कहा जाता है, और इसका निर्धारण महिला के पारिवारिक स्तर, उसकी बहनों या अन्य रिश्तेदारों के महर और उसकी अपनी योग्यताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। यदि पति अपनी पत्नी को तलाक देता है या उनके बीच खुला यानी आपसी सहमति से अलगाव होता है, तब भी महिला अपनी बकाया महर की राशि की पूरी हकदार बनी रहती है। तलाक के समय इद्दत की अवधि के दौरान और उसके बाद भी महर की देयता बनी रहती है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों के अनुसार मुस्लिम महिला अधिनियम के तहत भी यह स्पष्ट किया गया है कि महिला को उसके महर का भुगतान अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए। यदि पति महर देने से इनकार करता है, तो पत्नी दीवानी अदालत में मुकदमा दायर करके अपने इस अधिकार को कानूनी रूप से प्राप्त कर सकती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत भी महर के मामलों का निपटारा किया जाता है। यदि पति की मृत्यु हो जाती है, तो मृतक की संपत्ति के बँटवारे से पहले उसकी देनदारियों में महर का भुगतान एक प्राथमिकता होती है, और पत्नी अपने मृत पति की संपत्ति से महर की राशि वसूलने के लिए अन्य कानूनी वारिसों के मुकाबले प्राथमिकता रखती है। यहाँ तक कि अगर कोई महिला अपने पति से तलाक भी ले लेती है, तब भी उसे महर की पूरी राशि पाने का अधिकार रहता है बशर्ते उसने अपनी स्वेच्छा से महर को माफ न किया हो। कानूनी रूप से यह भी महत्वपूर्ण है कि महर माफ किया जा सकता है, लेकिन यह माफी पूरी तरह से महिला की अपनी स्वतंत्र इच्छा और बिना किसी दबाव के होनी चाहिए। यदि किसी महिला ने अपनी मर्जी से निकाह के समय या बाद में महर छोड़ दिया है, तो वह बाद में इसकी मांग नहीं कर सकती, परंतु दबाव या जबरदस्ती से लिया गया त्याग कानूनी रूप से मान्य नहीं होता है। इस प्रकार, महर हर विवाहित मुस्लिम महिला का एक ऐसा व्यक्तिगत और अमूल्य अधिकार है जिसे न तो छीना जा सकता है और न ही बिना उसकी सहमति के समाप्त किया जा सकता है।