Answer By law4u team
हाँ, शादी के बाद भी महर दिया जा सकता है, क्योंकि महर इस्लाम के तहत एक महिला का कानूनी और धार्मिक अधिकार है जो उसे उसके पति से विवाह के प्रतिफल के रूप में प्राप्त होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ और भारतीय कानूनी प्रणाली के अनुसार, महर दो प्रकार का हो सकता है: पहला 'महर-ए-मुअज्जल्' या त्वरित महर, जो विवाह के समय या मांग करने पर तुरंत देय होता है, और दूसरा 'महर-ए-मुवज्जल्' या विलंबित महर, जो विवाह विघटन यानी तलाक या पति की मृत्यु के समय दिया जाता है। यदि निकाह के समय महर की राशि तय नहीं की गई थी या उसका भुगतान तुरंत नहीं किया गया था, तो पत्नी को यह अधिकार रहता है कि वह शादी के बाद भी किसी भी समय महर की मांग करे और पति का यह कानूनी दायित्व बनता है कि वह उसका भुगतान करे। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम और भारतीय न्यायालयों के कई महत्वपूर्ण निर्णयों के अनुसार, महर की राशि एक कर्ज के समान है जो पति पर हमेशा बकाया रहता है जब तक कि उसका भुगतान नहीं कर दिया जाता। यदि पति शादी के बाद लंबे समय तक महर देने से इंकार करता है, तो पत्नी मुस्लिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के तहत सक्षम पारिवारिक न्यायालय में वाद दायर कर सकती है। न्यायालय इस मामले में पति को महर की राशि चुकाने का आदेश दे सकता है, और यह दावा शादी के कई वर्षों बाद भी किया जा सकता है क्योंकि इसके लिए एक निश्चित समयावधि तब तक शुरू नहीं होती जब तक कि पत्नी द्वारा महर की मांग न की जाए और पति उसे स्पष्ट रूप से देने से मना न कर दे। विवाह के समय यदि महर तय नहीं हुआ था, तो इसे 'उचित महर' या महर-ए-मिसल के रूप में निर्धारित किया जाता है, जिसकी गणना पत्नी की सामाजिक स्थिति, उसके परिवार की महिलाओं को मिलने वाले महर और पति की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर की जाती है। इसलिए, यदि निकाह के समय किसी कारणवश महर अदा नहीं किया गया था, तो पति अपनी जीवनकाल में कभी भी, यहाँ तक कि शादी के वर्षों बाद भी, अपनी पत्नी को महर की राशि दे सकता है और ऐसा करना इस्लाम के नियमों के साथ-साथ कानूनी रूप से भी पूरी तरह से वैध है। पत्नी को यह अधिकार भी है कि वह महर का भुगतान होने तक अपने पति के साथ रहने से इंकार कर सकती है यदि त्वरित महर का भुगतान अभी तक नहीं किया गया हो, हालांकि विलंबित महर के मामले में यह अधिकार तभी उत्पन्न होता है जब विवाह किसी कारण से समाप्त हो जाए। अंततः, भारतीय कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महर केवल एक रस्म नहीं बल्कि पत्नी का पूर्ण स्वामित्व वाला वित्तीय अधिकार है जिसे पति को हर हाल में निभाना होता है, और शादी के बाद इसे चुकाने पर किसी भी प्रकार की कानूनी बाधा नहीं है।