Answer By law4u team
बेलेबल और नॉन-बेलेबल अपराधों के बीच मुख्य अंतर बेल पाने के अधिकार और भारतीय क्रिमिनल लॉ के तहत अपराध की गंभीरता से जुड़ा है। बेलेबल अपराध: बेलेबल अपराध में, बेल आरोपी का कानूनी अधिकार है। पुलिस ऑफिसर या मजिस्ट्रेट बेल दे सकते हैं। ये अपराध आम तौर पर कम गंभीर होते हैं। उदाहरण: मामूली चोट मानहानि पब्लिक न्यूसेंस फीचर्स: बेल आम तौर पर मिलनी ही चाहिए। आरोपी बेल बॉन्ड भरकर रिहाई पा सकता है। सज़ा तुलना में कम गंभीर होती है। नॉन-बेलेबल अपराध: नॉन-बेलेबल अपराध में, बेल अपने आप मिलने वाला अधिकार नहीं है। बेल कोर्ट की मर्ज़ी से दी जाती है। ये अपराध आम तौर पर गंभीर होते हैं। उदाहरण: मर्डर रेप किडनैपिंग गंभीर आर्थिक अपराध खास बातें: पुलिस आमतौर पर गंभीर नॉन-बेलेबल अपराधों में रेगुलर बेल नहीं दे सकती। कोर्ट इन बातों पर विचार करता है: आरोप का नेचर सबूत फरार होने की संभावना गवाहों को धमकी गंभीर मामलों में बेल देने से मना किया जा सकता है। संबंधित कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता फर्स्ट शेड्यूल और संबंधित प्रावधानों में अपराधों को बेलेबल या नॉन-बेलेबल के रूप में बांटती है। महत्वपूर्ण अंतर: बेलेबल अपराध → बेल आमतौर पर एक अधिकार है। नॉन-बेलेबल अपराध → बेल कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है।