Answer By law4u team
भारत सरकार ने घरेलू निवेशकों और विदेशी निवेशकों के बीच संतुलन बनाने, देश में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी एफडीआई को आकर्षित करने और विदेशी निवेशकों को उचित सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से समय-समय पर कई देशों के साथ बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी यानी द्विपक्षीय निवेश संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं। यदि हम भारत के निवेश संधियों के इतिहास को देखें, तो भारत ने वर्ष 1994 में ब्रिटेन यानी यूनाइटेड किंगडम के साथ अपनी पहली बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद भारत ने दुनिया भर के विभिन्न देशों के साथ लगभग 83 से अधिक ऐसी संधियों पर हस्ताक्षर किए थे, जिन्हें बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एंड प्रमोशन एग्रीमेंट यानी बीआईपीए कहा जाता था। परंतु वर्ष 2010 से 2015 के दौरान, जब भारत को विदेशी निवेशकों द्वारा अंतरराष्ट्रीय पंचाट यानी इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन मामलों में कई बार घसीटा गया, तब भारत सरकार ने अपनी पुरानी निवेश संधियों की समीक्षा की। इन पुराने समझौतों में कई कमियां थीं, जिसके कारण निवेशकों ने भारतीय अदालतों के बजाय अंतरराष्ट्रीय अदालतों में भारत सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर के दावे ठोक दिए थे। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में एक नया मॉडल बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी का मसौदा तैयार किया। इस नए मॉडल का उद्देश्य निवेशकों के अधिकारों की रक्षा करना और साथ ही भारत की संप्रभुता तथा लोक कल्याण के लिए कानून बनाने के अधिकार को सुरक्षित रखना था। वर्ष 2015 के इस नए मॉडल के आधार पर भारत सरकार ने दुनिया के कई प्रमुख देशों के साथ नई बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया शुरू की और कई देशों के साथ समझौते संपन्न भी किए। वर्ष 2015 के नए मॉडल के तहत भारत ने सबसे पहले कंबोडिया के साथ वर्ष 2018 में समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद भारत ने बेलारूस, सर्बिया, ताइवान, किर्गिज़ गणराज्य, लिथुआनिया, यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात, ब्राजील और कोलंबिया जैसे देशों के साथ नए सिरे से निवेश संधियों पर बातचीत की है और कई समझौतों को अंतिम रूप दिया है। उदाहरण के लिए, भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संपन्न व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते यानी सीईपीए के बाद निवेश के क्षेत्र में भी द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत किया गया है। इसके अलावा, भारत ने यूरोपीय संघ यानी ईयू के साथ भी एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते और निवेश संधि को लेकर लंबी और विस्तृत बातचीत जारी रखी है। हालांकि, अधिकांश यूरोपीय देशों के साथ भारत की पुरानी निवेश संधियां वर्ष 2017 के आसपास समाप्त हो चुकी हैं क्योंकि भारत सरकार ने एकतरफा रूप से लगभग 58 देशों के साथ पुरानी संधियों को रद्द कर दिया था और उनसे नए मॉडल पर बातचीत करने का प्रस्ताव रखा था। वर्तमान में भारत का यह प्रयास रहता है कि किसी भी देश के साथ होने वाली नई बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी में राष्ट्रीय उपचार यानी नेशनल ट्रीटमेंट के नियम स्पष्ट हों, निवेशक पहले स्थानीय भारतीय अदालतों में अपने घरेलू कानूनी उपायों का पांच साल तक उपयोग करें, और उसके बाद ही वे अंतरराष्ट्रीय पंचाट में जा सकें। यदि कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 73 के तहत संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन सभी विषयों पर है जिन पर संसद कानून बना सकती है, और अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करना कार्यपालिका यानी केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि या बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी तब तक घरेलू स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं होती जब तक कि उसके प्रावधानों के अनुरूप संसद द्वारा आवश्यक कानून न बनाए जाएं या उन्हें अधिनियमित न किया जाए। भारत की इन नई बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी में यह भी स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि कराधान के उपाय, अनिवार्य लाइसेंसिंग और सार्वजनिक स्वास्थ्य या पर्यावरण से जुड़े लोक कल्याणकारी मामलों में यदि सरकार कोई नीतिगत बदलाव करती है, तो उसे निवेशकों के खिलाफ अप्रत्यक्ष अधिग्रहण यानी इनडायरेक्ट एक्सप्रोपिएशन नहीं माना जाएगा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और कानूनी प्रणाली की संप्रभुता पूरी तरह सुरक्षित रहती है।