Answer By law4u team
भारतीय कानून के अनुसार अदालत में झूठे सबूत देना या पेश करना एक बहुत ही गंभीर अपराध है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इसे न्याय व्यवस्था में बाधा डालने और धोखाधड़ी के रूप में देखा जाता है। जब कोई व्यक्ति अदालत की कार्यवाही के दौरान जानबूझकर झूठे सबूत पेश करता है या झूठा बयान देता है, तो उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विभिन्न प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। 1. अदालत में झूठे सबूत देने या झूठी गवाही देने के मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 227 और धारा 229 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाती है। यदि कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यवाही में झूठी गवाही देता है या ऐसा सबूत देता है जिसके बारे में उसे पता है कि वह झूठा है, तो उसे सात साल तक की कैद और जुर्माने की सजा मिल सकती है। यदि यह कृत्य किसी गंभीर मामले में या फांसी या उम्रकैद की सजा वाले मामले में किया जाता है, तो सजा और भी अधिक हो सकती है। 2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 232 और 233 के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर फर्जी दस्तावेज या झूठे सबूत गढ़ता है ताकि अदालत को धोखा दिया जा सके और गलत निर्णय लिया जा सके, तो उसे भी कठोर कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। अदालत में गलत दस्तावेज पेश करना, फर्जी हस्ताक्षर करना या जाली रसीदें देना इस श्रेणी में आता है। 3. यदि कोई व्यक्ति अदालत को गुमराह करने के लिए शपथ पत्र यानी एफिडेविट में झूठे तथ्य दर्ज करता है, तो वह शपथ पत्र पर झूठा बयान देने का दोषी माना जाता है। ऐसे व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के साथ-साथ नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) या दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 340 के तहत अदालत खुद स्वतः संज्ञान ले सकती है और मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करा सकती है। 4. अदालत में झूठे सबूत देने वाले व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 209 के तहत भी कार्रवाई हो सकती है, जो बेईमानी से अदालत में झूठा दावा करने या झूठी कार्यवाही शुरू करने से संबंधित है। यदि कोई पक्षकार अदालत में यह साबित होने पर कि उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज या सबूत पूरी तरह से जाली और मनगढ़ंत हैं, पकड़ा जाता है, तो अदालत उस पर भारी वित्तीय जुर्माना भी लगा सकती है। 5. झूठे सबूत पेश करने के गंभीर परिणाम होते हैं। नागरिक मामलों में, ऐसा करने वाले पक्षकार का दावा अदालत द्वारा खारिज किया जा सकता है और उसका मुकदमा तुरंत खारिज हो सकता है। आपराधिक मामलों में, अभियोजन पक्ष या बचाव पक्ष का जो भी व्यक्ति झूठे सबूत देते हुए पाया जाता है, उसके खिलाफ अदालत स्वयं तुरंत मुकदमा चलाने का आदेश दे सकती है। इस प्रकार के मामलों में अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है क्योंकि झूठे सबूत देना सीधे तौर पर न्याय प्रणाली की प्रक्रिया को प्रभावित करने और अदालत का अपमान करने के बराबर माना जाता है।