Law4u - Made in India

भारतीय कानून के तहत सॉवरेन इम्युनिटी क्या है?

Answer By law4u team

भारतीय कानून और न्यायिक प्रणाली में सॉवरेन इम्युनिटी (Sovereign Immunity) यानी संप्रभु उन्मुक्ति का सिद्धांत ब्रिटिश कॉमन लॉ के उस पुराने विचार पर आधारित था कि राजा कोई गलती नहीं कर सकता है, जिसका अर्थ यह था कि राज्य या सरकार को अपने अधिकारियों या कर्मचारियों के किसी भी गलत कृत्य या tortious act (अपकृत्य) के लिए अदालतों में आसानी से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता था। औपनिवेशिक काल के दौरान इस सिद्धांत को भारत में भी काफी हद तक लागू किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कामकाज में बाधा को रोकना और सरकारी खजाने को नागरिकों द्वारा किए जाने वाले मुकदमों और भारी हर्जाने के दावों से बचाना था। स्वतंत्रता के बाद, भारत के संविधान के लागू होने के साथ देश की विधिक व्यवस्था में एक बहुत बड़ा बदलाव आया, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जहाँ जनता सर्वोच्च है और देश का शासन संविधान के अनुसार चलता है, न कि किसी राजा की मर्जी से। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 (Article 300 of the Constitution) के अनुसार यह प्रावधान किया गया है कि भारत संघ और किसी भी राज्य की सरकारें कानूनी मुकदमे दायर कर सकती हैं और उन पर भी मुकदमे चलाए जा सकते हैं, और वे उसी प्रकार से उत्तरदायी हो सकती हैं जिस प्रकार ब्रिटिश भारत के डोमिनियन और उसके प्रांत संविधान लागू होने से पहले उत्तरदायी हुआ करते थे। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस अनुच्छेद ने ब्रिटिश काल की कानूनी स्थिति को तब तक बनाए रखा जब तक कि संसद या राज्य विधानमंडल इस संबंध में कोई नया कानून नहीं बना लेते, और आज तक भारत में इस विषय पर कोई व्यापक और स्पष्ट संहिताबद्ध कानून नहीं बनाया गया है। न्यायिक निर्णयों के विकास के माध्यम से भारतीय अदालतों, विशेषकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सॉवरेन इम्युनिटी के दायरे को समय के साथ काफी सीमित कर दिया है। ऐतिहासिक मामलों में अदालतों ने यह स्पष्ट किया है कि संप्रभुता के पारंपरिक कार्यों और गैर-संप्रभुता या वाणिज्यिक कार्यों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। संप्रभु कार्य वे कार्य होते हैं जो केवल राज्य द्वारा ही किए जा सकते हैं और जिनके लिए कोई निजी व्यक्ति मुकदमा नहीं कर सकता, जैसे कि देश की रक्षा करना, युद्ध लड़ना, शांति बनाए रखना, कूटनीतिक संबंध रखना और कानून व्यवस्था बनाए रखना। यदि सरकार द्वारा ऐसे संप्रभु कार्यों को करते समय नागरिकों को कोई नुकसान पहुँचता है, तो राज्य को सॉवरेन इम्युनिटी का लाभ मिल सकता है और वह हर्जाने के भुगतान से बच सकता है। दूसरी ओर, ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें सरकार या उसके कर्मचारी करते हैं लेकिन उन्हें विशुद्ध रूप से संप्रभु कार्य नहीं माना जाता है, जैसे कि व्यापारिक गतिविधियाँ, व्यावसायिक उपक्रम चलाना, सरकारी वाहन चलाना, रेलवे का संचालन करना, या कल्याणकारी योजनाएं चलाना। यदि सरकारी कर्मचारियों द्वारा ऐसे गैर-संप्रभु कार्यों के दौरान कोई लापरवाही (negligence) बरती जाती है और किसी नागरिक को शारीरिक चोट या संपत्ति का नुकसान होता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह फैसला सुनाया है कि राज्य सॉवरेन इम्युनिटी की आड़ लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है। ऐसे मामलों में सरकार को एक आम नियोक्ता की तरह उत्तरदायी माना जाएगा और पीड़ित नागरिक को हर्जाना देना होगा। इस संबंध में राजस्थान राज्य बनाम विद्यावती का मामला एक बहुत ही महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि राज्य सरकार अपने कर्मचारी की लापरवाही के लिए उतनी ही उत्तरदायी है जितनी कि कोई निजी कंपनी अपने कर्मचारी के लिए होती है, क्योंकि कल्याणकारी राज्य में मोटर गाड़ी चलाना कोई संप्रभु कार्य नहीं है। हालांकि, बाद के कस्तूरी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में अदालत ने एक अलग दृष्टिकोण अपनाया जहाँ पुलिस द्वारा अवैध रूप से जब्त किए गए सोने को वापस न कर पाने के मामले में यह माना गया कि पुलिस द्वारा संपत्ति की जब्ती एक संप्रभु कार्य (sovereign function) था, इसलिए राज्य इसके नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं है। कस्तूरी लाल के फैसले के बाद उत्पन्न हुई कठोरता को कम करने के लिए, भारतीय न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 (Article 21 of the Constitution) यानी जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का बहुत व्यापक अर्थ निकाला और पब्लिक लॉ रेमेडी (Public Law Remedy) का एक नया सिद्धांत विकसित किया। इसके तहत, यदि राज्य के किसी अधिकारी या पुलिस द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन किया जाता है, जैसे कि हिरासत में मौत (custodial death), अवैध हिरासत, पुलिस अत्याचार या फर्जी मुठभेड़, तो राज्य सॉवरेन इम्युनिटी का बचाव लेकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत सीधे तौर पर मुआवजे (compensation) का आदेश दिया जा सकता है, जो कि इस बात से स्वतंत्र होता है कि वह टोर्ट कानून के तहत दीवानी मुकदमे से अलग होता है। इस प्रकार, भारतीय कानून में सॉवरेन इम्युनिटी का सिद्धांत अब असीमित नहीं रहा है और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ इसका दायरा बहुत सिकुड़ गया है। यदि सरकार के कार्य संप्रभु प्रकृति के हैं तो उन्मुक्ति मिल सकती है, परंतु यदि कार्य वाणिज्यिक, प्रशासनिक, या लापरवाही से जुड़े हैं, या यदि राज्य के किसी कार्य से किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो सॉवरेन इम्युनिटी का बचाव सरकार को अदालतों में नहीं बचाया जा सकता है और सरकार को नागरिकों को हर्जाना देना ही होगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून Verified Advocates

Get expert legal advice instantly.

Advocate Mohammed Maqdoom Ali

Advocate Mohammed Maqdoom Ali

Domestic Violence, Divorce, High Court, Family, Property, Recovery, Child Custody, Civil, Anticipatory Bail, Muslim Law

Get Advice
Advocate Mohammed Kasim Wasim

Advocate Mohammed Kasim Wasim

Family, Landlord & Tenant, Muslim Law

Get Advice
Advocate Suresh Kumar Jasaiwal

Advocate Suresh Kumar Jasaiwal

Criminal,Family,Civil,High Court,Landlord & Tenant,Labour & Service,

Get Advice
Advocate Naveenkumar N

Advocate Naveenkumar N

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Child Custody, Criminal, Cyber Crime, Divorce, Documentation, Domestic Violence, Family, Medical Negligence, Motor Accident

Get Advice
Advocate Ashutosh Kumar Tripathi

Advocate Ashutosh Kumar Tripathi

Civil, Court Marriage, Divorce, Domestic Violence, Family

Get Advice
Advocate Rahul Bhobhriya

Advocate Rahul Bhobhriya

Family, Criminal, Cheque Bounce, Motor Accident, Child Custody, Court Marriage

Get Advice
Advocate Ajay Yadav Madhavan

Advocate Ajay Yadav Madhavan

Anticipatory Bail, Cheque Bounce, Child Custody, Consumer Court, Court Marriage, Criminal, Divorce, Documentation, Domestic Violence, Family, High Court, Landlord & Tenant, Recovery, RERA, Supreme Court, Medical Negligence, Succession Certificate, Civil, Banking & Finance, Cyber Crime, GST, Motor Accident, R.T.I

Get Advice
Advocate Pradeep Chaudhary

Advocate Pradeep Chaudhary

Anticipatory Bail,Arbitration,Armed Forces Tribunal,Bankruptcy & Insolvency,Banking & Finance,Breach of Contract,Cheque Bounce,Child Custody,Civil,Consumer Court,Corporate,Court Marriage,Customs & Central Excise,Criminal,Cyber Crime,Divorce,Documentation,GST,Domestic Violence,Family,High Court,Immigration,Insurance,International Law,Labour & Service,Landlord & Tenant,Media and Entertainment,Medical Negligence,Motor Accident,Muslim Law,NCLT,Patent,Property,R.T.I,Recovery,RERA,Startup,Succession Certificate,Tax,Trademark & Copyright,Wills Trusts,

Get Advice

अंतरराष्ट्रीय कानून Related Questions

Discover clear and detailed answers to common questions about Breach of Contract. Learn about procedures and more in straightforward language.