Answer By law4u team
भारतीय कानून के अनुसार जेल के कैदी कोर्ट मैरिज कर सकते हैं या नहीं, यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण और कानूनी पेचीदगियों से भरा हुआ है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत में विवाह मुख्य रूप से दो प्रमुख कानूनों के तहत पंजीकृत या संपन्न किए जाते हैं, जो हैं हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA)। इसके अलावा कुछ अन्य व्यक्तिगत कानून भी मौजूद हैं, लेकिन कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया विशेष रूप से विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत संचालित होती है। कानून किसी भी नागरिक को, भले ही वह विचाराधीन कैदी हो या सजायाफ्ता कैदी हो, विवाह करने के मौलिक अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21 of the Constitution) के तहत प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जिसके दायरे में अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार भी शामिल है। इसलिए कैदी होने मात्र से कोई व्यक्ति विवाह करने के अपने कानूनी अधिकार को नहीं खो बैठता है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से जेल के भीतर कोर्ट मैरिज करना एक बेहद जटिल और लंबी प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें जेल मैनुअल, कारागार प्रशासन के नियमों और संबंधित विवाह अधिकारी यानी मैरिज रजिस्ट्रार की औपचारिकताओं का पालन करना अनिवार्य होता है। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA) की प्रक्रिया के अनुसार विवाह करने के लिए सबसे पहली शर्त यह होती है कि दोनों पक्षों को जिला विवाह अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ता है। नोटिस देने की प्रक्रिया से लेकर विवाह के पंजीकरण के समय तक दोनों पक्षों का रजिस्ट्रार के सामने उपस्थित होना अनिवार्य माना गया है। जेल में बंद कैदी के मामले में यह उपस्थिति सबसे बड़ी बाधा बन जाती है, क्योंकि जेल प्रशासन किसी कैदी को अपनी इच्छा से बाहर जाने की अनुमति नहीं दे सकता है। ऐसी स्थिति में, यदि कैदी कोर्ट मैरिज करना चाहता है, तो उसे या उसके वकील को संबंधित पारिवारिक न्यायालय या क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष एक औपचारिक आवेदन प्रस्तुत करना पड़ता है। इस आवेदन में कैदी और उसके होने वाले जीवनसाथी की सहमति का पूरा विवरण देना होता है और अदालत से यह अनुरोध करना पड़ता है कि वह जेल अधीक्षक को निर्देश दे कि विवाह की औपचारिकताएं जेल परिसर के भीतर ही पूरी कराई जाएं। यदि अदालत इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि दोनों पक्षों की सहमति स्वतंत्र है और विवाह में कोई कानूनी अड़चन नहीं है, तो अदालत जेल परिसर में विवाह संपन्न कराने की अनुमति दे सकती है। विवाह अधिकारी या मैरिज रजिस्ट्रार को भी इस विशेष परिस्थिति के लिए राजी करना पड़ता है। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA) के प्रावधानों के तहत विवाह का नोटिस प्रकाशित किया जाता है और तीस दिनों की अवधि दी जाती है ताकि किसी को कोई आपत्ति हो तो वह दर्ज करा सके। यह नोटिस उस क्षेत्र के विवाह कार्यालय में लगाया जाता है जहां कैदी या उसका साथी निवास करता है। जब तीस दिन की अवधि पूरी हो जाती है और कोई वैध आपत्ति प्राप्त नहीं होती है, तब विवाह संपन्न कराने की तिथि तय की जाती है। चूंकि कैदी जेल से बाहर नहीं आ सकता, इसलिए विवाह अधिकारी या तो जेल के भीतर आकर सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर सकता है, या फिर न्यायालय के विशेष आदेश के तहत कैदी को कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच विवाह कार्यालय में पेश किया जा सकता है, हालांकि अधिकांश मामलों में जेल के भीतर ही रजिस्ट्रार की उपस्थिति में कागजी कार्रवाई पूरी करने का रास्ता अपनाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जेल मैनुअल के नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है, क्योंकि किसी भी बाहरी व्यक्ति का जेल के भीतर प्रवेश और विवाह जैसे समारोह का आयोजन जेल सुरक्षा और अनुशासन के दायरे में ही संभव हो पाता है। कैदियों के अधिकारों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि कैदियों के मानवाधिकार और मौलिक अधिकार जेल की चारदीवारी के भीतर पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते हैं। यद्यपि कारावास के दौरान कैदी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कुछ स्वाभाविक प्रतिबंध लग जाते हैं, लेकिन विवाह करना और परिवार बसाना एक ऐसा व्यक्तिगत अधिकार है जिस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। यदि कोई कैदी पैरोल या फर्लो पर बाहर आता है, तो उस अवधि के दौरान वह बिना किसी कानूनी बाधा के सामान्य प्रक्रिया के तहत कोर्ट मैरिज कर सकता है, क्योंकि पैरोल की अवधि में वह अस्थायी रूप से कानून की नजर में स्वतंत्र होता है और सामान्य नागरिकों की तरह विवाह पंजीकरण करा सकता है। लेकिन यदि कैदी को पैरोल नहीं मिल रही है और मामला लंबी सजा का है, तो उसे अदालत के माध्यम से ही जेल प्राधिकारी और विवाह रजिस्ट्रार को निर्देशित करवाना पड़ता है। अतः निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि जेल का कैदी कानूनी रूप से कोर्ट मैरिज करने का अधिकारी है, और कानून इसे पूरी तरह असंभव नहीं बनाता है, लेकिन इसके लिए एक लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कैदी के परिवार या उसके होने वाले जीवनसाथी को सबसे पहले एक सक्षम वकील की सहायता से संबंधित कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है, और अदालत की विशेष अनुमति प्राप्त होने के बाद ही जेल प्रशासन और विवाह रजिस्ट्रार के सहयोग से विवाह की प्रक्रिया को वैध रूप से पूरा किया जा सकता है। बिना अदालती अनुमति और प्रशासनिक समन्वय के जेल के भीतर इस प्रकार की कोई भी प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती है।