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क्या विदेशी फ़ैसले भारत में लागू किए जा सकते हैं?

Answer By law4u team

हाँ, विदेशी फ़ैसले भारत में लागू किए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए भारतीय दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होता है। भारत में विदेशी अदालतों के निर्णयों का प्रवर्तन इस सिद्धांत पर आधारित है कि एक सक्षम अदालत द्वारा दिया गया न्यायसंगत निर्णय अन्य न्यायक्षेत्रों में भी सम्मान और प्रभाव प्राप्त करना चाहिए, बशर्ते वह कुछ निश्चित कानूनी शर्तों को पूरा करता हो। दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 13 विदेशी निर्णयों की निर्णायक प्रकृति के बारे में बताती है। इसके अनुसार, भारत में किसी भी विदेशी निर्णय को तब तक निर्णायक नहीं माना जाएगा जब तक वह नीचे दी गई छह शर्तों में से किसी एक के अंतर्गत न आता हो, और यदि इनमें से कोई शर्त लागू होती है, तो वह निर्णय भारत में लागू या निष्पादित नहीं किया जा सकता है। 1. जहाँ निर्णय किसी ऐसे न्यायालय द्वारा नहीं दिया गया है जो मामले के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार रखता हो। इसका अर्थ है कि यदि विदेशी अदालत के पास उस मामले की सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था, तो उसका निर्णय भारत में शून्य और अप्रभावी माना जाएगा। 2. जहाँ निर्णय मामले की खूबियों या गुणों (on the merits of the case) के आधार पर नहीं दिया गया है। उदाहरण के लिए, यदि मामला बिना किसी सुनवाई या साक्ष्यों के केवल डिफ़ॉल्ट रूप में एकपक्षीय निर्णय के रूप में पारित कर दिया गया हो, तो उसे चुनौती दी जा सकती है। 3. जहाँ proceedings या विदेशी कार्यवाही भारतीय न्याय के सिद्धांतों (natural justice) के विरुद्ध प्रतीत होती है। यदि प्रतिवादी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया था या सुनवाई के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ था, तो ऐसा विदेशी फ़ैसला भारत में लागू नहीं होगा। 4. जहाँ निर्णय धोखाधड़ी या कपट (fraud) द्वारा प्राप्त किया गया है। यदि यह साबित हो जाता है कि वादी ने अदालत के साथ धोखाधड़ी करके या तथ्यों को छिपाकर वह विदेशी फ़ैसला हासिल किया था, तो भारतीय अदालतें उसे मान्यता नहीं देंगी। 5. जहाँ निर्णय भारत के किसी कानून के प्रावधान के विपरीत या उल्लंघन में है। यदि कोई विदेशी निर्णय भारतीय कानूनों या सार्वजनिक नीति (public policy) के विरुद्ध है, तो उसे भारत में लागू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उदाहरण के लिए, यदि कोई विदेशी निर्णय भारत के प्रचलित कानूनों के किसी मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है, तो उसे लागू नहीं किया जा सकता है। 6. जहाँ मुकदमा ऐसे मामले पर आधारित था जो भारत में लागू होने वाले कानून के तहत वर्जित है। इसके अलावा, विदेशी फ़ैसलों के निष्पादन के संबंध में दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 44A एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा उन विदेशी निर्णयों के निष्पादन से संबंधित है जो भारत के बाहर किसी ऐसे “व्युत्पन्न क्षेत्र” या परस्पर विरोधी क्षेत्र (reciprocating territory) के श्रेष्ठ न्यायालयों द्वारा दिए गए हैं जिन्हें केंद्र सरकार ने आधिकारिक राजपत्र में इस रूप में अधिसूचित किया है। यदि किसी पारस्परिक क्षेत्र से कोई फ़ैसला आता है, तो उसे भारत में सीधे निष्पादित किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे वह भारत की ही किसी जिला अदालत द्वारा पारित किया गया हो। इसके लिए वादी को भारत की संबंधित जिला अदालत में एक निष्पादन याचिका (execution petition) दाखिल करनी होती है, और साथ ही विदेशी न्यायालय के निर्णय की प्रमाणित प्रति और अन्य आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं। यदि कोई विदेशी फ़ैसला किसी गैर-पारस्परिक क्षेत्र (non-reciprocating territory) से आता है, तो प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है। गैर-पारस्परिक क्षेत्र के मामले में, आप उस विदेशी निर्णय के आधार पर भारत की अदालत में सीधे निष्पादन याचिका दाखिल नहीं कर सकते हैं। इसके बजाय, आपको उस विदेशी निर्णय या उसके मूल कारण (cause of action) के आधार पर भारत में एक नया मूल मुकदमा (fresh suit) दायर करना होगा। इस नए मुकदमे में, विदेशी निर्णय को साक्ष्य के एक मजबूत टुकड़े के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, और भारतीय अदालत उस विदेशी निर्णय की वैधता की जाँच धारा 13 के मानदंडों के आधार पर करेगी। यदि अदालत संतुष्ट हो जाती है कि निर्णय वैध है, तो वह भारत में एक नया डिक्री (decree) पारित करेगी, जिसे बाद में लागू किया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) भी एक बड़ी भूमिका निभाता है। गैर-पारस्परिक क्षेत्र के विदेशी निर्णय के आधार पर भारत में नया मुकदमा दायर करने की अवधि आमतौर पर विदेशी निर्णय की तिथि से तीन वर्ष होती है, जबकि पारस्परिक क्षेत्रों से आए निर्णयों के निष्पादन के लिए भी समय सीमा लागू होती है, इसलिए समय का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। अंततः, किसी भी विदेशी फ़ैसला को भारत में लागू कराने के लिए एक कुशल वकील की सहायता से उचित न्यायालय में दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के तहत सही कानूनी कार्रवाई शुरू करनी चाहिए।

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