Answer By law4u team
हाँ, पुलिस और शिकायतकर्ता दोनों ही अग्रिम जमानत यानी एंटीसिपेटरी बेल के आदेश को चुनौती दे सकते हैं। भारतीय कानून के तहत, यदि किसी निचली अदालत या सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने किसी आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी है, तो इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील या चुनौती दाखिल की जा सकती है। इसके बाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का रुख भी किया जा सकता है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure, 1973 - CrPC) की धारा 438 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 के तहत सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दी जाती है। जब किसी आरोपी को अग्रिम जमानत मिल जाती है, तो राज्य सरकार की ओर से पुलिस या फिर जिस व्यक्ति ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई है, यानी शिकायतकर्ता या पीड़ित, वे इस आदेश से संतुष्ट न होने पर कानूनी उपायों का उपयोग कर सकते हैं। पुलिस की भूमिका इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण होती है। CrPC की धारा 439(2) या BNSS के संगत प्रावधानों के अनुसार, उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति को दी गई जमानत को रद्द (cancel) कर सकता है। पुलिस आमतौर पर राज्य सरकार के लोक अभियोजक (Public Prosecutor) के माध्यम से उच्च न्यायालय में जमानत रद्द करने के लिए आवेदन करती है। पुलिस के पास यह तर्क देने का अधिकार होता है कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है, सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, गवाहों को डरा-धमका सकता है, या यदि आरोपी को जमानत पर खुला छोड़ा गया तो समाज में कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है या वह देश छोड़कर भाग सकता है। यदि पुलिस या राज्य सरकार इन तर्कों को अदालत के सामने मजबूती से साबित कर देती है, तो उच्च न्यायालय अग्रिम जमानत के आदेश को रद्द कर सकता है। दूसरी ओर, शिकायतकर्ता या पीड़ित व्यक्ति के पास भी यह पूरा अधिकार है कि वह एंटीसिपेटरी बेल को चुनौती दे। हालांकि पीड़ित सीधे तौर पर हर मामले में निचली अदालत के आदेश के खिलाफ स्वतः अपील नहीं कर सकता, लेकिन वह उच्च न्यायालय में CrPC की धारा 482 या BNSS के तहत अंतःनिहित शक्तियों (inherent powers) का उपयोग करके याचिका दायर कर सकता है। इसके अलावा, पीड़ित व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition - SLP) के माध्यम से भी अनुच्छेद 136 (Article 136 of the Constitution) के तहत चुनौती दे सकता है। हाल के कई न्यायिक फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अपराध के पीड़ित व्यक्ति को सुनवाई का पूरा अधिकार है और यदि अदालत ने बिना उचित कारणों के या तथ्यों को नजरअंदाज करके आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी है, तो पीड़ित उसे चुनौती दे सकता है। जब पुलिस या शिकायतकर्ता अग्रिम जमानत को चुनौती देते हैं, तो न्यायालय मुख्य रूप से कुछ प्रमुख बिंदुओं पर विचार करता है। इनमें सबसे पहले देखा जाता है कि अपराध की गंभीरता (gravity of the offence) क्या है। यदि मामला बहुत गंभीर प्रकृति का है, जैसे कि हत्या, बलात्कार, या गंभीर आर्थिक धोखाधड़ी, तो जमानत देना न्याय हित के खिलाफ माना जा सकता है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि क्या निचली अदालत ने आदेश पारित करते समय प्रासंगिक तथ्यों और साक्ष्यों को नजरअंदाज किया है। तीसरा, क्या आरोपी के फरार होने की या न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने की कोई वास्तविक संभावना है। अतः संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अग्रिम जमानत का आदेश कोई अंतिम निर्णय नहीं होता। यदि पुलिस या शिकायतकर्ता को यह लगता है कि जमानत के गलत या दुर्भावनापूर्ण आदेश से न्याय की हत्या हो रही है या जांच प्रभावित हो रही है, तो वे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में उचित कानूनी याचिका दायर करके उस आदेश को सफलतापूर्वक चुनौती दे सकते हैं और उसे रद्द करवा सकते हैं।