Answer By law4u team
हाँ, एक अनिवासी भारतीय (NRI) विदेश में रहते हुए भी भारत की अदालतों में कानूनी कार्यवाही शुरू कर सकता है और केस फाइल कर सकता है। भारत का कानून और नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) एनआरआई नागरिकों को अपनी संपत्ति, परिवार, व्यवसाय और अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए भारतीय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटमाने का पूरा अधिकार देता है। एनआरआई को व्यक्तिगत रूप से भारत आने की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि वे कानूनी माध्यमों से अपने मामलों का संचालन कर सकते हैं। भारत के सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के प्रावधानों के अनुसार, विदेशी धरती पर रहने वाला कोई भी भारतीय नागरिक भारत में वाद (suit) दायर कर सकता है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) होता है। यदि एनआरआई भारत में आकर तुरंत कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकता है, तो वह अपने किसी विश्वस्त रिश्तेदार, मित्र या वकील के नाम पर पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर सकता है। इस पावर ऑफ अटॉर्नी को उस देश के भारतीय दूतावास या महावाणिज्य दूतावास (Embassy or Consulate) से सत्यापित (attested) कराना अनिवार्य होता है, जहाँ एनआरआई वर्तमान में रह रहा है। इसके बाद, भारत पहुँचने पर इस दस्तावेज को राज्य के नियमों के अनुसार विधिवत स्टाम्प ड्यूटी देकर पंजीकृत कराया जाता है, ताकि इसके आधार पर भारत में अदालत में याचिका दायर की जा सके। पारिवारिक मामलों के लिए, जैसे कि तलाक, बच्चों की कस्टडी, या भरण-पोषण, एनआरआई हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) या अन्य पर्सनल लॉ के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं। यदि पति या पत्नी में से कोई एक विदेश में है, तो आधुनिक तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (ITA) के तहत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी गवाही और सुनवाई की अनुमति भारतीय अदालतें दे रही हैं। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल विदेश में रहने के कारण किसी व्यक्ति को भारतीय अदालतों में अपने वैवाहिक या संपत्ति के अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। संपत्ति विवादों के मामलों में, जैसे कि पैतृक संपत्ति पर कब्जा, अवैध कब्जा, या किराएदारों से विवाद, विशिष्ट राहत अधिनियम (Specific Relief Act) और संपत्ति अंतरण अधिनियम (TP Act) के तहत एनआरआई सीधे सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर सकते हैं। यदि एनआरआई की संपत्ति पर किसी ने अवैध कब्जा कर लिया है या उसके साथ धोखाधड़ी हुई है, तो वह भारतीय दंड संहिता (IPC) या नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत पुलिस में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकता है या मजिस्ट्रेट के समक्ष फौजदारी शिकायत (criminal complaint) भी दाखिल कर सकता है। कई राज्यों में एनआरआई की संपत्तियों और मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें भी स्थापित की गई हैं। दस्तावेज़ीकरण और साक्ष्यों के प्रस्तुतीकरण के संबंध में, यदि कोई एनआरआई विदेश से दस्तावेज भेजना चाहता है, तो उसे दूत या अंतरराष्ट्रीय कूरियर के माध्यम से मूल दस्तावेज भेजने होते हैं। साक्षियों की गवाही के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने का प्रावधान भी होता है, जिसके तहत विदेशी धरती पर भारतीय दूतावास के अधिकारी के समक्ष गवाही दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल साक्ष्यों को भी भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) के नए स्वरूप भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत मान्यता दी जाती है, जिससे डिजिटल माध्यम से दस्तावेज और हलफनामा (affidavit) भेजना आसान हो गया है। हलफनामे को भी विदेशी नोटरी पब्लिक और भारतीय राजनयिक अधिकारी द्वारा सत्यापित कराया जाना आवश्यक होता है। अंत में, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जब कोई एनआरआई भारत में केस फाइल करता है, तो उसे क्षेत्राधिकार (jurisdiction) के नियमों का पालन करना होता है। उदाहरण के लिए, यदि संपत्ति दिल्ली में है, तो मुकदमा दिल्ली की अदालत में ही दायर किया जाएगा, भले ही वाди अमेरिका या यूके में रह रहा हो। वकीलों की नियुक्ति के लिए भी ईमेल, वीडियो कॉल और डिजिटल हस्ताक्षरों का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए भौगोलिक दूरी भारतीय अदालतों में न्याय प्राप्त करने में कोई कानूनी बाधा उत्पन्न नहीं करती है, बशर्ते सभी प्रक्रियात्मक और दस्तावेजी औपचारिकताएं सही तरीके से पूरी की गई हों।