Answer By law4u team
इंटरनेशनल क्रिमिनल लॉ या अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून में यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन यानी सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार एक ऐसा कानूनी सिद्धांत है जिसके तहत दुनिया का कोई भी देश, उस देश की अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर, उसके नागरिकों द्वारा न किए जाने पर भी, और उस देश के हितों को सीधे प्रभावित न करने वाले गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए किसी भी संदिग्ध व्यक्ति पर मुकदमा चला सकता है। इसका मुख्य आधार यह है कि कुछ अपराध इतने घृणित और मानवता के खिलाफ होते हैं कि वे केवल किसी एक विशेष राष्ट्र के खिलाफ नहीं बल्कि पूरी मानवता के खिलाफ अपराध माने जाते हैं, और इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के किसी भी सभ्य राष्ट्र को यह अधिकार और कर्तव्य मिलना चाहिए कि वह अपराधियों को न्याय के कठघरे में ला सके। यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन के दायरे में आमतौर पर जिंसोसाइड यानी नरसंहार, क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी यानी मानवता के खिलाफ अपराध, वॉर क्राइम्स यानी युद्ध अपराध, टॉर्चर यानी यातना और पायरेसी यानी समुद्री डकैती जैसे बेहद गंभीर अपराध शामिल किए जाते हैं। पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी भी देश को किसी विदेशी धरती पर हुए अपराध पर अधिकार क्षेत्र तभी मिलता था जब उस मामले से उस देश का कोई सीधा संबंध हो, जैसे कि पीड़ित या आरोपी उस देश का नागरिक हो, या अपराध उस देश की सीमा के भीतर हुआ हो। लेकिन यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन इस पारंपरिक क्षेत्रीय सीमा की दीवार को तोड़ता है और इस सार्वभौमिक अवधारणा को स्वीकार करता है कि यदि कोई तानाशाह या युद्ध अपराधी अपनी स्वदेशी न्याय व्यवस्था से बच निकलता है, तो दुनिया का कोई भी अन्य देश अपनी अदालत में उसे सजा दे सकता है। इस सिद्धांत की उत्पत्ति और विकास में ऐतिहासिक रूप से पायरेसी के खिलाफ लड़ाई का बड़ा योगदान रहा है, क्योंकि समुद्र के लुटेरों को होस्टिस हमानी जेनेरिस यानी पूरी मानव जाति का शत्रु माना जाता था, जिन्हें पकड़ने और सजा देने का अधिकार किसी भी नौसैनिक देश के पास होता था। आधुनिक समय में इस सिद्धांत को कानूनी मान्यता देने में न्यूरेमबर्ग ट्रायल्स और टोक्यो ट्रायल्स जैसी ऐतिहासिक न्यायिक प्रक्रियाओं ने बड़ी भूमिका निभाई, जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाजी और जापानी युद्ध अपराधियों पर अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानूनों के उल्लंघन के लिए मुकदमे चलाए गए थे। इसके बाद जिनेवा कन्वेंशन 1949 जैसे कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधियों ने भी गंभीर उल्लंघनों के मामलों में सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार के सिद्धांतों को मजबूत किया और सदस्य देशों को यह बाध्यता दी कि वे ऐसे अपराधियों को या तो खुद न्याय के कटघरे में लाएं या फिर किसी अन्य योग्य देश को प्रत्यर्पित करें। व्यावहारिक रूप से, यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन दो रूपों में लागू होता है जिन्हें एब्सोल्यूट यानी पूर्ण और कंडीशनल यानी सशर्त रूप में विभाजित किया जा सकता है। पूर्ण सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार के तहत कोई भी देश आरोपी की उपस्थिति के बिना भी मुकदमे की कार्यवाही शुरू कर सकता है, जबकि सशर्त सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार के तहत यह अनिवार्य शर्त होती है कि आरोपी व्यक्ति उस देश के भौतिक क्षेत्र में मौजूद होना चाहिए जहाँ मुकदमा चलाया जा रहा है ताकि निष्पक्ष सुनवाई और प्रत्यर्पण के नियमों का पालन किया जा सके। कई देशों ने अपनी घरेलू आपराधिक दंड संहिताओं में ऐसे प्रावधान किए हैं जिसके तहत उनकी अदालतें विदेश में हुए नरसंहार या युद्ध अपराधों के मामलों की सुनवाई कर सकती हैं, भले ही उस मामले से उस देश का कोई प्रत्यक्ष संबंध न रहा हो। इस सिद्धांत के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि यह दुनिया भर के मानवाधिकार रक्षकों और पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करने का एक अंतिम हथियार है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून की दंडमुक्ति की संस्कृति को समाप्त करता है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठे क्रूर शासक या तानाशाह यह सोचकर निश्चिंत नहीं बैठ सकते कि वे अपने देश की न्यायपालिका को नियंत्रित करके अपने अपराधों पर पर्दा डाल लेंगे, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि विदेश यात्रा के दौरान किसी अन्य देश की अदालत उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। इस सिद्धांत ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय को और अधिक प्रभावी बनाया है और दुनिया को यह संदेश दिया है कि गंभीर मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ताओं के लिए पृथ्वी पर कोई भी सुरक्षित ठिकाना नहीं बचना चाहिए। दूसरी ओर, इस कानूनी सिद्धांत की कई गंभीर आलोचनाएं और व्यावहारिक सीमाएं भी हैं, जिनके कारण इसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। कई देशों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस शक्ति का प्रयोग बिना किसी नियंत्रण के किया जाए तो यह राजनीतिक प्रतिशोध का एक साधन बन सकता है, जहां ताकतवर देश चुनिंदा तरीके से कमजोर देशों के नेताओं या अधिकारियों को निशाना बना सकते हैं। इसके अलावा, कई बार इससे कूटनीतिक तनाव उत्पन्न हो जाते हैं क्योंकि एक संप्रभु राष्ट्र की अदालतें दूसरे संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों या आधिकारिक कार्यों पर फैसला सुनाने का प्रयास करती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ जा सकता है। यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन के सफल क्रियान्वयन में सबूतों को जुटाना, गवाहों की अनुपस्थिति और विदेशी अदालतों की भाषाई और सांस्कृतिक सीमाएं भी बड़ी बाधाएं बनती हैं, क्योंकि किसी अन्य देश में हुए अपराध की तह तक पहुँचना स्थानीय पुलिस और न्याय व्यवस्था के सहयोग के बिना बेहद कठिन हो जाता है। यही कारण है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी आईसीजे और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी आईसीआई जैसे वैश्विक मंचों की स्थापना की आवश्यकता महसूस की जाती है ताकि राष्ट्रीय अदालतों की सीमाओं को पार करते हुए एक केंद्रीय और निष्पक्ष संस्थान के माध्यम से ऐसे जटिल मामलों की सुनवाई की जा सके। अंततः, इंटरनेशनल क्रिमिनल लॉ में यूनिवर्सल जूरिस्डिक्शन न्याय की सार्वभौमिकता और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच एक बेहद नाजुक संतुलन को दर्शाता है। एक तरफ यह विचार मानवता की सामूहिक अंतरात्मा की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि सबसे बड़े अपराधों के लिए कोई भी अपराधी सजा से न बचे, तो दूसरी तरफ यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कानून के बीच की व्यावहारिक वास्तविकताओं से भी जूझता है। जैसे-जैसे वैश्विक न्याय व्यवस्था विकसित हो रही है, सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार का यह सिद्धांत दुनिया भर के मानवाधिकार आंदोलनों और अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, जो भविष्य में तानाशाही और अत्याचार के खिलाफ एक मजबूत निवारक के रूप में कार्य करता रहेगा।