Answer By law4u team
भारत में कोर्ट मैरिज विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act, 1955) के प्रावधानों के तहत संपन्न होती है। जब कोई जोड़ा कोर्ट मैरिज के लिए जिला विवाह अधिकारी (Marriage Officer) के समक्ष आवेदन करता है, तो अधिनियम की धारा 5 के तहत एक नोटिस प्रकाशित किया जाता है। इस नोटिस की प्रति को कार्यालय के एक दृश्यमान स्थान पर चस्पा किया जाता है और यदि आवश्यक हो तो इसे संबंधित क्षेत्रों के विवाह अधिकारियों को भी भेजा जाता है। विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत किसी भी व्यक्ति को इस विवाह पर आपत्ति दर्ज कराने का कानूनी अधिकार दिया गया है। आपत्ति केवल तभी वैध मानी जाती है जब वह अधिनियम की शर्तों के उल्लंघन पर आधारित हो, जैसे कि किसी भी पक्ष की कानूनी उम्र पूरी न होना, पक्षकारों के बीच कोई ऐसा संबंध होना जो कानून द्वारा वर्जित हो, या फिर किसी एक पक्ष का पहले से जीवित पति या पत्नी का होना जिसका तलाक वैध रूप से न हुआ हो, या फिर किसी पक्षकार का मानसिक रूप से सक्षम न होना। जब कोई वैध आपत्ति दर्ज की जाती है, तो विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 के प्रावधान लागू हो जाते हैं। विवाह अधिकारी के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह प्राप्त आपत्ति की जांच करे। जांच की इस प्रक्रिया के कारण कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया में निश्चित रूप से देरी हो सकती है। विवाह अधिकारी दोनों पक्षों और आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने का अवसर देता है। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्यतः तीस दिन से लेकर दो महीने या उससे अधिक का समय लग सकता है, क्योंकि साक्ष्यों की जांच और दस्तावेजों का सत्यापन करना विवाह अधिकारी के लिए आवश्यक होता है। यदि विवाह अधिकारी आपत्ति को सही पाता है, तो वह विवाह करने से इंकार कर सकता है। ऐसी स्थिति में विवाह अधिकारी के आदेश के खिलाफ तीस दिनों के भीतर जिला न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, जिसके कारण कानूनी प्रक्रिया और लंबी हो सकती है और इसमें कई महीने की देरी हो सकती है। दूसरी ओर, यदि विवाह अधिकारी को यह लगता है कि दर्ज की गई आपत्ति पूरी तरह से आधारहीन, तुच्छ या व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित है, जो विशेष विवाह अधिनियम, 1955 के कानूनी मानदंडों के अंतर्गत नहीं आती है, तो वह उस आपत्ति को खारिज कर सकता है। ऐसी स्थिति में विवाह की प्रक्रिया में कोई लंबी देरी नहीं होती है, हालांकि इस जांच के दौरान भी कुछ दिनों का समय अवश्य लग सकता है। इसके अलावा, विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8(2) के तहत यदि कोई व्यक्ति बिना किसी ठोस या पर्याप्त कानूनी आधार के दुर्भावनापूर्ण तरीके से आपत्ति दर्ज कराता है, तो विवाह अधिकारी उस व्यक्ति पर पाँच सौ रुपये तक का जुर्माना भी लगा सकता है, जो प्रभावित पक्षकारों को हर्जाने के रूप में दिया जा सकता है। इसलिए केवल तभी देरी होती है जब आपत्ति तकनीकी और कानूनी रूप से गंभीर प्रकृति की हो। कानूनी रूप से यह भी समझना आवश्यक है कि विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के तहत नोटिस प्रकाशित होने के बाद तीस दिन की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period) होती है। इस तीस दिन की अवधि के दौरान ही कोई भी व्यक्ति अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। यदि इस निर्धारित तीस दिन की अवधि के भीतर कोई भी आपत्ति प्राप्त नहीं होती है, तो विवाह अधिकारी इस अवधि की समाप्ति के बाद विवाह को संपन्न कराने के लिए आगे बढ़ सकता है, बशर्ते अन्य सभी दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी हों। लेकिन यदि इस अवधि के अंतिम दिन या बीच में कोई आपत्ति आ जाती है, तो भले ही तीस दिन पूरे हो चुके हों, विवाह तब तक संपन्न नहीं किया जा सकता जब तक कि विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 के तहत उस आपत्ति का विधिवत निपटारा न कर लिया जाए। इस प्रकार, आपत्ति का आना और उसका कानूनी निस्तारण होना सीधे तौर पर विवाह में देरी का मुख्य कारण बनता है। यदि आप कोर्ट मैरिज करने जा रहे हैं और किसी भी प्रकार की संभावित देरी या कानूनी अड़चन से बचना चाहते हैं, तो यह अत्यंत आवश्यक है कि आप आवेदन करने से पहले सभी कानूनी योग्यताओं को अच्छी तरह जांच लें। सुनिश्चित करें कि दोनों पक्षों की उम्र पूरी हो, वे अपनी स्वतंत्र सहमति से विवाह कर रहे हों, और उनके पिछले किसी भी विवाहित संबंध का कानूनी रूप से अंत हो चुका हो। यदि किसी तीसरे पक्ष द्वारा बिना किसी उचित कारण के जानबूझकर परेशान करने के लिए आपत्ति दर्ज कराई जाती है, तो आप कानूनी सलाह ले सकते हैं और विवाह अधिकारी के समक्ष अपने पक्ष को मजबूती से रख सकते हैं ताकि बिना किसी unjustified delay के विवाह की प्रक्रिया को समय पर पूरा किया जा सके।