Answer By law4u team
भारत में वयस्क व्यक्तियों को अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह करने का पूर्ण और मौलिक अधिकार प्राप्त है। यदि कोई व्यक्ति बास्क है, अर्थात उसकी आयु कानून द्वारा निर्धारित विवाह योग्य आयु पूरी हो चुकी है, तो वह अपने माता-पिता या परिवार की सहमति के बिना भी अपनी इच्छा से विवाह कर सकता है। भारतीय कानून और संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं, जिसके तहत एक वयस्क अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र है। कानूनी रूप से विवाह के लिए न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। यदि कोई लड़का 21 वर्ष से अधिक आयु का है और लड़की 18 वर्ष से अधिक आयु की है, तो वे कानून की नजर में बास्क माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने माता-पिता की रजामंदी लेने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यदि वे दोनों बास्क हैं और अपनी स्वेच्छा से बिना किसी दबाव, धोखाधड़ी या बल प्रयोग के विवाह करते हैं, तो उनका विवाह पूरी तरह से वैध माना जाएगा। माता-पिता की सहमति के बिना विवाह करने के लिए भारत में मुख्य रूप से दो प्रमुख कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं। पहला रास्ता हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत धार्मिक रीति-रिवाजों से विवाह करना है, जैसे आर्य समाज मंदिर में या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर विवाह संपन्न कराना। दूसरा और अधिक सार्वभौमिक रास्ता विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत कोर्ट मैरिज करना है, जो सभी धर्मों के नागरिकों पर लागू होता है और इसमें किसी भी प्रकार की धार्मिक औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती है। विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत विवाह करने के लिए जोड़े को अपने क्षेत्र के विवाह अधिकारी के पास एक नोटिस देना होता है। इस नोटिस के बाद 30 दिनों की अवधि के लिए सार्वजनिक आपत्ति आमंत्रित की जाती है। यदि इन 30 दिनों के भीतर किसी की ओर से कोई वैध कानूनी आपत्ति नहीं आती है, तो विवाह अधिकारी तीन गवाहों की उपस्थिति में विवाह को पंजीकृत कर देता है। इस प्रक्रिया में माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं होती है, हालांकि इस अधिनियम के तहत नोटिस की प्रक्रिया के कारण माता-पिता को इसकी जानकारी मिल सकती है, यदि वे उसी क्षेत्र में रहते हैं। दूसरी ओर, यदि कोई जोड़ा आर्य समाज मंदिर या किसी अन्य मंदिर में हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत विवाह करता है, तो विवाह संपन्न होने के तुरंत बाद विवाह प्रमाण पत्र प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उस प्रमाण पत्र के आधार पर विवाह का औपचारिक पंजीकरण नगर निगम या संबंधित सरकारी कार्यालय में कराया जाता है। इस प्रक्रिया में भी बास्क होने के कारण माता-पिता की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। यदि माता-पिता इस प्रकार के विवाह से नाखुश हैं और वे जोड़े को परेशान करते हैं, तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21 of the Constitution) के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सहारा लिया जा सकता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि बास्क जोड़ों को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है और उनके इस अधिकार में परिवार या समाज द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। यदि परिवार के सदस्यों द्वारा नवविवाहित जोड़े को किसी प्रकार की धमकी दी जाती है या हिंसा का सामना करना पड़ता है, तो वे सीधे पुलिस थाने में सुरक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं। सुरक्षा प्राप्त करने के लिए जोड़ा किसी भी उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 226 (Article 226 of the Constitution) के तहत प्रावधान है। न्यायालय बास्क जोड़ों को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का आदेश दे सकता है ताकि उनके जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा हो सके। इसके अलावा, यदि कोई बास्क लड़की अपनी मर्जी से अपने पति के साथ रहना चाहती है, तो पुलिस या अदालत माता-पिता के दबाव में उसे उनके साथ भेजने के लिए बाध्य नहीं कर सकती, क्योंकि कानूनन वह एक स्वतंत्र वयस्क नागरिक है। इस प्रकार, निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि भारत में माता-पिता की सहमति विवाह की वैधता के लिए कोई अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है। बशर्ते लड़का और लड़की दोनों बास्क हों, उन्होंने अपनी स्वेच्छा से विवाह किया हो और वे किसी भी प्रकार की प्रतिबंधित रिश्तेदारी के दायरे में न आते हों, तो उनका विवाह कानून की नजर में पूरी तरह से वैध और मान्य होता है। माता-पिता की सहमति न होने पर भी वे एक सम्मानजनक और सुरक्षित वैवाहिक जीवन जी सकते हैं और कानून उनकी पूरी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करता है।