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क्या तलाक के लिए अर्जी देने से पहले अलग होना ज़रूरी है?

21-Oct-2026
तलाक

Answer By law4u team

भारतीय कानून के तहत तलाक के लिए अर्जी देने से पहले पति-पत्नी का अलग रहना यानी अलग निवास करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी और व्यावहारिक आवश्यकता है, विशेषकर जब आप आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) या विवाह के विच्छेद के लिए अन्य आधारों की मांग कर रहे हों। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत तलाक के विभिन्न प्रावधान हैं, और उनमें अलग रहने की अवधि का अलग-अलग महत्व और कानूनी अनिवार्यता है। इस विषय को विस्तार से समझने के लिए हमें अधिनियम के विभिन्न पहलुओं, कानूनी धाराओं और अदालत के रुख का गहराई से विश्लेषण करना होगा। 1. आपसी सहमति से तलाक के मामले में अलग रहने की कानूनी अनिवार्यता: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13-बी (Section 13-B) के अनुसार, यदि पति और पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं, तो उनके लिए यह अनिवार्य है कि वे तलाक की अर्जी दाखिल करने से ठीक पहले कम से कम एक साल की अवधि तक अलग-रह रहे हों। इस एक वर्ष की अवधि के दौरान, उनका एक साथ पति-पत्नी के रूप में रहना बंद हो जाना चाहिए। कानून की दृष्टि से अलग रहने का मतलब केवल एक ही घर के अलग कमरों में रहना नहीं है, बल्कि वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह से टूट जाना और पति-पत्नी के रूप में साथ न रहना है। यदि यह एक साल की अवधि पूरी नहीं हुई है, तो पारिवारिक न्यायालय (Family Court) आपसी सहमति से तलाक की पहली गति (First Motion) की याचिका को स्वीकार नहीं करेगा। 2. एक साल की अवधि की गणना और अपवाद: यह एक साल की अवधि तलाक की याचिका दाखिल करने की तारीख से ठीक पीछे की ओर गिनी जाती है। कई बार लोग पूछते हैं कि क्या इस एक साल की अवधि में कोई छूट मिल सकती है? न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 14 के तहत विवाह के पहले वर्ष के भीतर आम तौर पर कोई भी तलाक की याचिका दाखिल नहीं की जा सकती है, सिवाय इसके कि याचिकाकर्ता को असाधारण कठिनाई (Exceptional Hardship) या प्रतिवादी के असाधारण depravity का सामना करना पड़ रहा हो। हालांकि, धारा 13-बी के तहत एक साल तक अलग रहने की शर्त आपसी सहमति के मामलों में एक अनिवार्य शर्त है, और अदालतें आमतौर पर इस समयावधि में ढील नहीं देती हैं, क्योंकि कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जो जोड़े अलग हो रहे हैं, उन्होंने जल्दबाजी में नहीं बल्कि सोच-समझकर और पर्याप्त समय तक अलग रहने के बाद यह निर्णय लिया है। 3. विवाहित जीवन के अन्य आधारों पर तलाक और अलग रहना: यदि आप आपसी सहमति से नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट आधार पर तलाक मांग रहे हैं, जैसे कि क्रूरता (Cruelty), परित्याग (Desertion), व्यभिचार (Adultery), या मानसिक विकार, तो कानून के तहत अलग रहना एक पूर्व-शर्त के रूप में हमेशा अनिवार्य नहीं होता, लेकिन यह उस आधार को साबित करने का सबसे बड़ा सबूत बनता है। उदाहरण के लिए, यदि आप परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक मांग रहे हैं, तो कानून के तहत प्रतिवादी को बिना किसी उचित कारण के कम से कम दो साल तक लगातार आपको छोड़ कर अलग रहना पड़ा होगा। इसी तरह, यदि आप क्रूरता के आधार पर तलाक चाहते हैं, तो क्रूरता की घटनाओं के बाद का अलग रहना इस बात को पुष्ट करता है कि साथ रहना अब असंभव हो गया है। 4. अलग रहने का वास्तविक कानूनी अर्थ: कानूनी भाषा में अलग रहने (Living Separately) का अर्थ केवल भौगोलिक दूरी नहीं है, बल्कि वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन न करना है। यदि पति और पत्नी किसी मजबूरी के कारण, जैसे कि नौकरी या पढ़ाई, अलग-अलग शहरों में रहते हैं, लेकिन उनके बीच शारीरिक और मानसिक संबंध सामान्य रूप से बने हुए हैं, तो इसे कानूनी रूप से वैवाहिक अलगाव नहीं माना जाएगा। अलग रहने का मतलब है कि समाज की नजरों में और आपस में पति-पत्नी के रूप में रहना उन्होंने बंद कर दिया है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13-बी के तहत यह साबित करना होता है कि दोनों पक्ष अपनी मर्जी से या परिस्थितियों के कारण एक वर्ष से अधिक समय से अलग जीवन बिता रहे हैं और उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। 5. विशेष विवाह अधिनियम और अन्य धर्मों के कानून: यदि आपका विवाह विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत हुआ है, तो उसमें भी आपसी सहमति से तलाक के लिए एक साल या उससे अधिक समय तक अलग रहने का प्रावधान है। इसी प्रकार, अन्य व्यक्तिगत कानूनों में भी तलाक की कार्यवाही शुरू करने से पहले पति-पत्नी के बीच अलगाव की अवधि को महत्वपूर्ण माना जाता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विवाह का बंधन पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। 6. अलग रहने के दौरान भरण-पोषण और बच्चों की कस्टडी के अधिकार: जब पति-पत्नी तलाक की अर्जी देने से पहले अलग रहना शुरू करते हैं, तो उनके कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होते। पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 24 और 25 के तहत अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण (Maintenance) का दावा कर सकती है। अलग रहने के दौरान यदि कोई विवाद होता है, तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के संबंधित प्रावधानों के तहत भी गुजारा भत्ता मांगा जा सकता है। अलग रहने का यह मतलब नहीं है कि पति या पत्नी अपने वित्तीय दायित्वों से मुक्त हो गए हैं। 7. सुलह की कोशिशें और अलग रहने की अवधि: अदालतें हमेशा यह देखती हैं कि क्या अलग रहने की इस अवधि के दौरान पति-पत्नी के बीच फिर से एक साथ आने की कोई संभावना बची है या नहीं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) के तहत पारिवारिक न्यायालय पहले काउंसलिंग (Counseling) सत्र आयोजित करते हैं ताकि यदि संभव हो तो जोड़े को फिर से मिलाया जा सके। लेकिन यदि एक साल या उससे अधिक समय तक अलग रहने के बाद भी दोनों पक्षों का रुख कठोर रहता है और वे साथ रहने के लिए तैयार नहीं होते हैं, तो न्यायालय तलाक की डिक्री पारित करने की दिशा में आगे बढ़ता है। निष्कर्ष रूप में, यदि आप आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं, तो अर्जी देने से पहले एक साल तक अलग रहना कानूनन जरूरी है। यदि आप अन्य आधारों पर जा रहे हैं, तो अलग रहना तलाक के आधार को मजबूत करता है, लेकिन हर मामले की अपनी विशिष्ट परिस्थितियां होती हैं, इसलिए अदालत में जाने से पहले किसी अनुभवी पारिवारिक वकील से परामर्श अवश्य करें।

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