Answer By law4u team
भारतीय कानून के तहत एक वैध विवाह (Valid Marriage) वह है जो किसी मान्यता प्राप्त पर्सनल लॉ या विशेष कानून के तहत सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है। भारत में विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग विवाह कानून हैं, जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) जो हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है। इसके अलावा मुसलमानों के लिए शिया और सुन्नी पर्सनल लॉ, ईसाइयों के लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 (ICMA) और सभी धर्मों के लोगों के लिए एक धर्मनिरपेक्ष कानून विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA) उपलब्ध है। किसी भी विवाह को कानूनी रूप से वैध होने के लिए कुछ बुनियादी और अनिवार्य शर्तों को पूरा करना आवश्यक होता है जो कानून द्वारा निर्धारित की गई हैं। सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त यह है कि विवाह के समय दोनों पक्षों में से किसी का भी कोई जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए। भारतीय दंड संहिता (IPC) Section 494 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत द्विपत्नीक विवाह या बहुविवाह को अपराध घोषित किया गया है, सिवाय उन मामलों के जहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को कुछ सीमित शर्तों के तहत अनुमति है। यदि पहले पति या पत्नी के जीवित रहते हुए और कानूनी तलाक लिए बिना दूसरा विवाह किया जाता है, तो वह विवाह शून्य (Void) माना जाएगा और उसे वैध नहीं कहा जा सकता। दूसरी मुख्य शर्त दोनों पक्षों की सहमति और उनकी मानसिक क्षमता से संबंधित है। विवाह के लिए दोनों पक्षों की स्वतंत्र और वैध सहमति (Free Consent) होना अनिवार्य है। यदि किसी पक्ष की सहमति जबरदस्ती, धोखाधड़ी, बल प्रयोग या गलत बयानी के आधार पर ली गई है, तो ऐसा विवाह शून्यकरणीय (Voidable) हो जाता है, जिसे पीड़ित पक्ष अदालत के माध्यम से रद्द करवा सकता है। इसके अलावा विवाह के समय दोनों पक्षों में से कोई भी ऐसा मानसिक विकार से पीड़ित नहीं होना चाहिए जिससे वह वैध विवाह के योग्य न हो, या पागलपन के दौरे न पड़ते हों, जिससे संतान की उत्पत्ति और पालन-पोषण प्रभावित हो सके। तीसरी शर्त दोनों पक्षों की कानूनी आयु (Legal Age of Marriage) से जुड़ी है। भारत में कानून के अनुसार विवाह के समय वर की आयु कम से कम इक्कीस वर्ष और वधू की आयु कम से कम अठारह वर्ष होनी चाहिए। यदि इनमें से कोई भी पक्ष निर्धारित न्यूनतम आयु से कम उम्र का है, तो वह विवाह बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत अवैध या दंडनीय हो सकता है, हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत कम उम्र में किया गया विवाह सीधे तौर पर शून्य नहीं घोषित किया जाता, लेकिन इसे कानून का उल्लंघन माना जाता है। चौथी शर्त निषिद्ध संबंधों की डिग्री (Degrees of Prohibited Relationship) और सपिंड संबंधों (Sapinda Relationships) से संबंधित है। कानून के अनुसार ऐसे करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह प्रतिबंधित है जो निषिद्ध या सपिंड की श्रेणी में आते हैं, जब तक कि संबंधित समुदाय के रूढ़िगत रिवाजों या परंपराओं द्वारा इसकी अनुमति न दी गई हो। यदि कोई जोड़ा इन वर्जित संबंधों के दायरे में शादी करता है, तो वह विवाह कानूनी रूप से अमान्य घोषित किया जा सकता है। पाँचवीं बात यह है कि कुछ विशेष कानूनों जैसे विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह संपन्न करने के लिए विवाह रजिस्ट्रार के पास पूर्व नोटिस देना, गवाहों की उपस्थिति और कुछ विधिक औपचारिकताओं को पूरा करना आवश्यक होता है। हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम जैसे पारंपरिक कानूनों में सप्तपदी (सात फेरे) या प्रचलित रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान पूरा होने पर विवाह वैध मान लिया जाता है, लेकिन आज के समय में कानूनी सुरक्षा और सरकारी कार्यों के लिए विवाह का पंजीकरण (Marriage Registration) करवाना अनिवार्य कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट और कई राज्य कानूनों के अनुसार विवाह का पंजीकरण कानूनी सबूत के रूप में बहुत महत्वपूर्ण है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय कानून के तहत एक वैध विवाह वही है जो सही आयु, स्वतंत्र सहमति, उचित मानसिक स्थिति, निषिद्ध संबंधों के नियमों का पालन न करने की स्थिति और लागू होने वाले पर्सनल लॉ या सिविल मैरिज एक्ट के सभी अनुष्ठानों या वैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा करके किया गया हो। यदि इनमें से कोई भी मुख्य कानूनी शर्त पूरी नहीं होती है, तो अदालत उस विवाह को शून्य या अमान्य घोषित कर सकती है, जिससे उत्तराधिकार, भरण-पोषण और संपत्ति के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।