Answer By law4u team
भारत सरकार विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों की सुरक्षा, उनके अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए कई कानूनी, प्रशासनिक और कूटनीतिक कदम उठाती है। विशेष रूप से खाड़ी देशों और अन्य विकासशील देशों में जाने वाले अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए सुरक्षा का एक मजबूत ढांचा तैयार किया गया है। इस व्यवस्था का मुख्य आधार उत्प्रवास अधिनियम, 1983 (Emigration Act, 1983) है, जिसके तहत विदेशी रोजगार को विनियमित किया जाता है और श्रमिकों के शोषण को रोका जाता है। विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के अंतर्गत एक समर्पित उत्प्रवास नीति प्रभाग है जो इन सभी मामलों की देखरेख करता है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, सुरक्षा प्रमाण (Emigration Clearance) प्राप्त करना अनिवार्य होता है, विशेषकर उन देशों के लिए जिन्हें ईसीआर (Emigration Check Required) श्रेणी में रखा गया है। यह जांच सुनिश्चित करती है कि कामगारों को मिलने वाला वेतन और काम करने की स्थिति उचित है या नहीं, ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के धोखे या जबरन श्रम से बचाया जा सके। सरकार ने विदेशों में भारतीय श्रमिकों की सहायता के लिए कई डिजिटल प्लेटफॉर्म और पोर्टल बनाए हैं, जिनमें ई-माइग्रेट पोर्टल (e-Migrate Portal) सबसे प्रमुख है। इस पोर्टल के माध्यम से रिक्रूटमेंट एजेंटों का पंजीकरण किया जाता है, विदेशी नियोक्ताओं का सत्यापन होता है और रोजगार समझौतों की ऑनलाइन निगरानी की जाती है। यदि कोई विदेशी नियोक्ता अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो इस प्रणाली के माध्यम से तुरंत कार्रवाई की जाती है। भारत के दूतावासों और उच्च आयोगों (Embassies and High Commissions) में भारतीय समुदाय कल्याण कोष (Indian Community Welfare Fund - ICWF) की स्थापना की गई है। यह कोष उन भारतीय कामगारों को तत्काल वित्तीय और कानूनी सहायता प्रदान करता है जो संकट में फंस जाते हैं, जैसे कि वेतन न मिलना, पासपोर्ट जप्त होना, अवैध हिरासत में होना, या गंभीर बीमारी और दुर्घटना का शिकार होना। इसके तहत दूतावासों में लेबर विंग (Labour Wing) और 24 घंटे काम करने वाले हेल्पलाइन नंबर या कॉल सेंटर भी संचालित होते हैं, जिन्हें मदद के लिए तुरंत संपर्क किया जा सकता है। विदेशों में कामगारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए मिशन स्तर पर वकीलों के पैनल बनाए गए हैं जो स्थानीय अदालतों में श्रमिकों के मामलों की पैरवी करते हैं। इसके अलावा, प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र (Pravasi Bharatiya Sahayata Kendra - PBSK) के माध्यम से बहुभाषी परामर्श और मार्गदर्शन सेवाएं प्रदान की जाती हैं ताकि कामगार अपनी भाषा में शिकायत दर्ज करा सकें और कानूनी सलाह ले सकें। भारत सरकार कई देशों के साथ द्विपक्षीय श्रम समझौतों (Bilateral Labour Agreements) और समझौता ज्ञापनों (Memorandums of Understanding) पर हस्ताक्षर करती है। इन समझौतों का उद्देश्य कामगारों के कामकाजी घंटों, ओवरटाइम, छुट्टियों, स्वास्थ्य बीमा, सुरक्षित आवास और सुरक्षित repatriation की गारंटी देना है। यदि कोई विदेशी नियोक्ता इन समझौतों का उल्लंघन करता है, तो भारत सरकार राजनयिक चैनलों के माध्यम से उस देश की सरकार पर दबाव बनाती है। संकट की स्थिति में, जैसे कि गृह युद्ध, प्राकृतिक आपदा, या वैश्विक महामारी, भारत सरकार बड़े पैमाने पर बचाव अभियान चलाती है, जिन्हें ऑपरेशन (Operation) कहा जाता है। इसके तहत विशेष उड़ानों और नौसेना के जहाजों का उपयोग करके फंसे हुए भारतीय कामगारों को पूरी तरह से सुरक्षित उनके स्वदेश वापस लाया जाता है, जिसका पूरा खर्च सरकार उठाती है। इस प्रकार, कानूनी ढांचे, वित्तीय सहायता, राजनयिक दबाव और आपातकालीन निकासी योजनाओं के जरिए भारत सरकार विदेशों में अपने नागरिकों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करती है।