Answer By law4u team
भारत में कानून के अनुसार यदि दो वयस्क (यानी जिनकी आयु लड़के के मामले में इक्कीस वर्ष और लड़की के मामले में अठारह वर्ष पूरी हो चुकी है) अपनी स्वेच्छा से विवाह करना चाहते हैं, तो माता-पिता कानूनी तौर पर उन्हें शादी करने से सीधे तौर पर नहीं रोक सकते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार मिला है, जिसमें अपनी पसंद के जीवनसाथी को चुनना और विवाह करना भी शामिल है। उच्चतम न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से विवाह करते हैं, तो परिवार, समाज या किसी भी बाहरी व्यक्ति को इसमें दखल देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यदि वयस्क अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं, तो वे Special Marriage Act, 1954 या किसी भी पर्सनल लॉ के तहत, यदि शर्तें पूरी होती हैं, तो कानूनी रूप से विवाह संपन्न कर सकते हैं। माता-पिता या परिवार के पास वयस्कों की शादी को रोकने के लिए कोई सिविल या क्रिमिनल मुकदमा दायर करने का अधिकार केवल इस आधार पर नहीं है कि वे इस रिश्ते से नाखुश हैं। अक्सर माता-पिता बालिग लड़की या लड़के पर दबाव बनाने के लिए पुलिस थाने में बहला-फुसलाकर भगा ले जाने (अध-हरण या किडनैपिंग) जैसी झूठी शिकायतें दर्ज करा देते हैं। इस स्थिति में कानूनी सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि वयस्क जोड़े को लगता है कि उनकी जान या स्वतंत्रता को परिवार या पुलिस से खतरा है, तो वे सीधे उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) या पुलिस सुरक्षा के लिए याचिका दायर कर सकते हैं। यदि लड़की बालिग है और उसने अपनी मर्जी से घर छोड़ा है और वह अपनी मर्जी से किसी लड़के के साथ रहना या शादी करना चाहती है, तो पुलिस या माता-पिता उसे जबरन हिरासत में नहीं रख सकते और न ही लड़के के खिलाफ कोई आपराधिक मामला बनता है, क्योंकि बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं भी आने-जाने और रहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यदि माता-पिता या कोई अन्य व्यक्ति इस विवाह के कारण बालिग जोड़े को धमकाता है, उन पर शारीरिक हिंसा करता है, या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में पीड़ित जोड़े संबंधित पुलिस स्टेशन में या पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत दे सकते हैं और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई की मांग कर सकते हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने "शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ" मामले में ऑनर किलिंग और खाप पंचायतों के विरोध में कड़े निर्देश दिए हैं, जिसके तहत हर जिले में विशेष पुलिस सेल बनाए गए हैं ताकि अंतर-जातीय या अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले वयस्क जोड़ों को धमकियों या हिंसा से बचाया जा सके और उन्हें तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान की जा सके। यहाँ यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि यद्यपि माता-पिता विवाह को रोक नहीं सकते, परंतु विवाह की कुछ कानूनी औपचारिकताएं और शर्तें पूरी होना आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए, यदि विवाह Special Marriage Act के तहत रजिस्टर कराया जा रहा है, तो तीस दिन पहले एक नोटिस देना होता है, जिस दौरान यदि कोई वैध कानूनी आपत्ति (जैसे कि पहले से विवाहित होना, या मानसिक रूप से सक्षम न होना) आती है, तो विवाह रोका जा सकता है। इसके अलावा, यदि कोई पक्ष बालिग नहीं है या किसी पक्ष की आयु कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा से कम है, तो Prohibition of Child Marriage Act, 2006 के तहत बाल विवाह को अवैध घोषित किया जा सकता है और ऐसा विवाह करने या करवाने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। परंतु यदि दोनों पक्ष पूर्ण रूप से वयस्क हैं, पूरी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ हैं, और अपनी स्वतंत्र सहमति से बिना किसी धोखाधड़ी या दबाव के विवाह कर रहे हैं, तो माता-पिता का विरोध केवल एक पारिवारिक असहमति बनकर रह जाता है, जिसे कानूनन मान्यता या बल नहीं दिया जा सकता।