Answer By law4u team
भारत में पारिवारिक कानून यानी पर्सनल लॉ विभिन्न समुदायों के धार्मिक ग्रंथों, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और संसद द्वारा बनाए गए अधिनियमों पर आधारित है। भारत एक ऐसा देश है जहां विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेना और संरक्षकता जैसे मामलों के लिए कोई एक समान सिविल संहिता लागू नहीं है, बल्कि प्रत्येक धर्म के अनुयायियों के लिए अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं अस्तित्व में हैं। अंग्रेजों के शासनकाल के समय से ही भारत में धर्म के आधार पर नागरिक कानूनों को विभाजित किया गया था, जो आज भी काफी हद तक जारी है। हिंदू कानून के अंतर्गत वे सभी लोग आते हैं जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं। इसमें बौद्ध, जैन और सिख धर्म के लोग भी शामिल किए जाते हैं। हिंदू पारिवारिक मामलों को नियंत्रित करने के लिए संसद ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 बनाया है, जो विवाह की शर्तों, विवाह की अमान्यता, न्यायिक अलगाव और तलाक के आधारों को स्पष्ट करता है। इसके अलावा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 पुरुषों और महिलाओं दोनों को संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करता है। हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 बच्चों की देखभाल और जरूरतमंद आश्रितों के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं। मुस्लिम पारिवारिक कानून मुख्य रूप से शरीयत पर आधारित है और इसे विनियमित करने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 लागू किया गया था। इसके साथ ही मुसलमानों के बीच विवाह और तलाक के मामलों में मुस्लिम विवाह का विघटन अधिनियम, 1939 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि भारत में अभी भी शरिया के असंहिबद्ध नियम कई मामलों में लागू होते हैं, लेकिन तीन तलाक को अब मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत अवैध और आपराधिक घोषित कर दिया गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पैतृक संपत्ति में पुरुषों और महिलाओं के हिस्से अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं। ईसाई समुदाय के पारिवारिक मामले भारतीय विवाह अधिनियम, 1872 और भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो चर्च विवाह और तलाक की कानूनी प्रक्रिया को निर्धारित करते हैं। पारसी समुदाय के लिए पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 लागू होता है। इन सभी धार्मिक कानूनों के अलावा, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष कानून है जो भारत के किसी भी नागरिक को अपनी पसंद के व्यक्ति से धर्म की सीमा से परे जाकर कोर्ट मैरिज करने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है। इस अधिनियम के तहत शादी करने वाले जोड़ों पर उनके व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों के बजाय नागरिक कानून लागू होते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली में सभी धर्मों से ऊपर उठकर कुछ ऐसे भी पारिवारिक कानून हैं जो सार्वभौमिक रूप से हर नागरिक पर लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के संबंधित प्रावधान के तहत किसी भी धर्म की महिला, बच्चे या माता-पिता अपने पति या संतान से भरण-पोषण पाने का दावा कर सकते हैं, यदि वे अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं। इसी तरह घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) हर धर्म की महिलाओं को घरेलू हिंसा के खिलाफ नागरिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2005 देश में बाल विवाह को पूरी तरह से अवैध घोषित करता है, चाहे किसी भी धर्म का पर्सनल लॉ क्या कहता हो। भारत में पारिवारिक अदृश्यता और विवादों को सुलझाने के लिए पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 के तहत फैमिली कोर्ट बनाए गए हैं, जो वैवाहिक विवादों का समाधान आपसी सुलह और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से करते हैं।